भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 573

558 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। यदि स्त्री और पुरुष एक जैसा काम करते हैं, यदि वे राज्य के समान नागरिक की तरह कार्य करते हैं, यदि वे राज्य के प्रति समान रूप से अपना उत्तरादायित्व पूरा करते हैं। तो स्त्री के सम्पत्ति अधिकार के मामले में इस भेदभाव पूर्ण कानून कैसे बना सकते हैं? जब तक हम स्त्री को सम्पत्ति का पूरा हिस्सा नहीं देते, तब तक उससे यह आशा नहीं कर सकते कि वह राज्य के प्रति अपना दायित्व पूरी तरह निभाएंगी। वास्तव में जब भी हमने कोई परिवर्तन किया है, स्थापित रीति-रिवाजों और स्थापित कानून प्रभावित हुए हैं। इससे थोड़ी व्यवस्था गड़बड़ाई है और असुविधा हुई है परन्तु हमने उसको बर्दाश्त किया है और इसे अनिवार्य माना है। इससे होने वाली असुविधा को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहिए। डॉ. अम्बेडकर और अन्य साथियों ने बताया है कि स्मृतियों में स्त्री के सम्पत्ति के अधिकार को स्वीकार किया गया है। जो कछ हमें कानून ने दिया उसे प्रथाओं ने अस्वीकार कर दिया। व्यवहार में अधिकार को रद्द कर दिया गया। हम यही करने का प्रयास कर रहे हैं। हम हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों या हिंदू रीति -रिवाजों या हिंदू कानून के विरोध में नहीं हैं बल्कि जो हिदू कानून ने हमें दिया और जिसे मनमाने ढंग से छीन लिया गया, उसे वापस लेने का प्रयास कर रहे हैं जिसे समाज ने पिछले वर्षों में हमें नहीं दिया। यह केवल न्याय किया जो लम्बे अर्से से अपेक्षित था।

यदि आप आधुनिक समय की बात करते हैं तो 1937 के अधिनियम में पत्नी, पुत्र-वधु, पोते की पत्नी आदि को सम्पत्ति का अधिकार दिया गया है। केवल पुत्री को छोड़ दिया गया है। अब इसे शामिल करना उचित होगा। अतः इसमें ज्यादा बहस करने वाली कोई बात दिखाई नहीं देती। यदि अन्य स्त्रियों को यह अधिकार दिया गया है, यदि वह पति की सम्पत्ति में उत्तराधिकारी है, तो उसे पिता की सम्पत्ति में अधिकार मिलना चाहिए। यह बहुत स्वाभाविक और उचित है।

माननीय श्री जगजीवन रामः वे उसे अन्य स्तरों पर आगे बढ़ाना चाहते हैं।

श्रीमती सुचेता कृपलानीः जहां तक संयुक्त परिवार का संबंध है, इसके बारे में उत्तेजना है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि इतनी उत्तेजना क्यों है। मैं बहुत से लोगों से मिली हूँ, वे संयुक्त परिवार से बाहर होने के लिए बेताब हैं। पुत्र अपने पिता के साथ नहीं रहना चाहते। पूरे देश के बहुत सारे संयुक्त परिवार टूटे हैं। अतः मेरे अनुसार संयुक्त परिवार की व्यवस्था बड़ी तेजी से टूट रही है। यहां तक कि संयुक्त परिवार का कानूनन स्थिति भी दोषपूर्ण है, जैसा कि सुबह डॉ. अम्बेडकर ने बताया है। यहां तक कि मिताक्षरा प्रणाली में भी संयुक्त परिवार का कोई सदस्य सम्पत्ति में बंटवारा मांग सकता है।

अतः मैं पूछना चाहता हूँ कि संयुक्त परिवार है कहां, जिसके बारे में आप इतना शोर मचा रहे हैं।