560 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लिए कहें। यदि ऐसा हो रहा है, तो क्यों न हमें इसे स्वीकार कर लें। जब यह प्रचलन में है, तो इसे मान्यता प्रदान कर इसे वैधता क्यों न प्रदान कर दें।
जहां तक एकपत्नी विवाह के प्रश्न का संबंध है, मैं समझती हूँ कि समाज ने इस विवाह को स्वीकृति प्रदान कर दी है। बहुपत्नी विवाह को घृण की दृष्टि से देखा जाता है और इसे समाज का समर्थन नहीं मिला है, यद्यपि ऐसे विवाह होते हैं। अधिकांश हिंदुओं ने वर्तमान प्रथा को मान्यता प्रदान की है और हम इसे कानूनी रूप प्रदान कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, जब हम एक ऐसे समाज का निर्माण करने जा रहे हैं, जिसमें महिला और पुरुष को बराबर का दर्जा प्रदान किया गया है, तो हम महिलाओं और पुरुषों के लिए दोहरी नैतिकता नहीं निर्धारित कर सकते। मैं समझती हूँ कि पुरुषों के लिएतो यह
खुशी की बात है क्योंकि एक पत्नी विवाह की व्यवस्था करके हम पुरुष की नैतिकता के स्तर को बढ़ाकर महिला की नैतिकता के स्तर के बराबर कर रहे हैं। मैं समझती हूँ कि पुरुषों को हमें धन्यवाद देना चाहिए।
एक माननीय सदस्यः आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हम आमदनी से तलाक ले सकते हैं और दूसरा विवाह कर सकते हैं।
श्रीमती सुचेता कृपलानीः जहां तक तलाक के प्रश्न का संबंध है, हम रूढि़वादी लोगों के विचारों से असहमत नहीं हैं, परन्तु, प्राचीन ग्रन्थों में भी तलाक की व्यवस्था थी। तलाक के लिए जिन आधारों और कारणों की अनुमति दी गई है, वे उपयुक्त और न्यायोचित हैं। हमने छोटी-मोटी बातों पर तलाक की अनुमति नहीं दी है, जैसा कि पश्चिम के देशों में होता है। हमने इस बात का ध्यान रखा है कि तलाक का सहारा बहुत ही गंभीर परिस्थितियों में लिया जाना चाहिए। यदि हम बड़ौदा, त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार का रिकार्ड देखें तो पता चलता है कि बहुत कम लोगों ने इस मामले में कानून का सहारा लिया है। अपवादात्मक परिस्थितियों में कठिन स्थिति से छुटकारा पाने के लिए इसका सहारा लिया जाता है। हिंदू समाज में यह प्रथा है कि छोटे-मोटे कारणों से तलाक के लिए न्यायालय की ओर नहीं दौड़ते। जो लोग यह सोचते हैं कि तलाक का अधिकार देने से हिंदुओं के पारिवारिक जीवन की शांति भंग हो जाएगी, बिल्कुल गलत है।
प्रातः डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि 90 प्रतिशत हिंदुओं में तलाक का प्रचलन है तो क्यों न शेष 10 प्रतिशत लोगों पर भी इसे लागू कर दिया जाए। शेष 10 प्रतिशत लोगों पर इसे लागू करना उचित होगा। यदि कोई तलाक न हो, तो यह ठीक है। परन्तु महिला और पुरुष तलाक चाहते हैं, तो वे हिंदू धर्म छोड़कर मुसलमान या ईसाई बन जाते हैं। और ऐसा करके वे अपने फायदे के लिए उन धर्मों का इस्तेमाल कर उन धर्मों का अपमान करते हैं। अतः हमें वर्तमान परिस्थितियों को स्वीकार कर, तलाक की अनुमति दे देनी चाहिए।