भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 579

564 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जनमत के अनुरूप नया रूप दिया जाएगा। यही वह बात थी, जिससे डॉ. मित्तर को परेशानी थी। वस्तुतः उन्होंने पाया कि उनकी सोच भारतीय जनमत, जो उनके विचारों के विरूद्ध है, की सोच से काफी आगे है।

इसलिए उन्होंने अधिसूचना में इस अनुच्छेद का उल्लेख किया है, जिसमें सरकार द्वारा विधेयक में भारतीय जनमत के अनुरूप परिवर्तन लाने की बात कही गई है। अब डॉ. मित्तर बाढ़ देखते हुए अपने विचार बदल लिए है। यह ऐसा कानून है, जिसने पूरे देश को प्रभावित किया, यही कारण है कि उन्हें विधेयक के विरुद्ध जाना पड़ा, क्योंकि जनमत यही है। जनमत के सम्मान में अपने व्यक्तिगत विचारों का परित्याग करना अतार्कित नहीं है। मेरा विश्वास है कि माननीय मंत्री और अन्य मंत्रियों के भी व्यक्तिगत विचार हैं, सामूहिक भलाई के लिए उन्हें अपने विचारों को दबाना पड़ता है। मैंने मंत्रियों को अक्सर अपनी विचारधारा के खिलाफ बोलते सुना है। ऐसा करना अनुचित या गलत नहीं है। यह बिल्कुल स्वाभाविक है। यहाँ डॉ. मित्तर ने जनमत की भावनाओं को जानने और तनदुसार विधेयक में परिवर्तन लाते हुए इस विधेयक को नया रुख देने का बहुत बड़ा लोक-उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया है। मैं पूछता हूँः अगर डॉ. डी.एन. मित्तर ने अपने विचार बदल लिए हैं, तो इसमें गलत क्या है? उन्होंने एक कार्य की जिम्मेदारी ली और वह जिम्मेदारी क्या थी? जनमत का पता करना और जनमत विधेयक के विरुद्ध था। जब राय ली जा रही थी, तब वह स्वयं मौजूद थे और मौखिक साक्ष्य से संबंधित रिपोर्ट में एक अनुच्छेद है जो महत्वपूर्ण है और इसका विशेष तौर पर उल्लेख किया गया है। जब समिति लाहौर में थी और ....

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः उन्हें काले झंडे दिखाए गए?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मात्र काले झंडे नहीं उससे भी जयादा। महिलाओं की भारी संख्या, हजारों में मुझे सही संख्या याद नहीं है-मैं सही संख्या बताकर सदन को भी परेशान नहीं करना चाहता।

माननीय अध्यक्षः वह कौन-सा वर्ष था?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः यह सब इस जाँच के संबंध में 1945 में हुआ था। वे लाहौर गए थे, जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ आईं और उन्होंने साक्ष्य के कार्य को बाघित किया। उन्होंने कहा, ‘‘हमें यह नहीं चाहिए। इससे हमें कोई फायदा नहीं होगा। यह हमारी सोच के विरुद्ध है।’’

बाबू रामनारायण सिंहः सुनिए, सुनिए।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः वस्तुतः हालात इतने गंभीर थे कि जब उनके सामने महिलाएँ हजारों की संख्या में इस बिल का विरोध कर रही थीं, तो वह आगे नहीं बढ़