भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 582

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जनमत प्राप्त किया, वह उसके विरुद्ध था। इसलिए हमें, जनमत सुनिश्चित कराना चाहिए। जो बाद में, विधेयक को विभिन्न प्रांतीय सरकारों के पास विचार-विमर्श के लिए भेजा गया था। पर विभिन्न सरकारों की सलाहों को भी सदन में संदर्शित नहीं किया गया। इन्हें एकत्रित करके सदस्यों के बीच परिचालित अवश्य किया गया। बहरहाल, मैं केवल बंगाल सरकारे के मत के विषय में कहना चाहूँगा मैं, विरोध के किसी डर के बिना कहता हूँ कि बंगाल में विरोध अत्यधिक हैं। वहाँ आप उत्तराधिकार की ‘मिताक्षर’ पद्धती समाप्त करने का प्रस्ताव रख रहे हैं और बंगाल में उसे उनकी परिवारिक जीवन में स्वीकार करने के लिए कह रहे है। इसीलिए बंगाल में आपका सबसे बड़ा विरोध होगा।

एक माननीय सदस्यः आपत्तियाँ तो हर ओर से है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः यकीनन, आपत्तियाँ सभी जगह से हैं। कुछ शिक्षित एवं संस्कारी महिलाओं सहित संपूर्ण बंगाल की सोच है कि विधेयक की यहां दरकार नहीं है। वस्तुतः कई महिलाएं जैसे स्वर्गीय श्री आशुतोष की पत्नी जो डॉ. मुखर्जी की माँ है, तथा श्री बी.एन. मुखर्जी की पत्नी, श्रीमती रानू मुखर्जी एवं अन्य महिलाओं ने भी प्रस्ताव का विरोध किया है।

डॉ. मोन मोहन दासः अन्य महिलाएँ कौन हैं, कृपया उनके नाम भी बताएँ?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मुझे अध्यक्ष महोदय के अनुरोध का आदर करना है कि इसे जल्द समाप्त करूं। मैं अध्यक्ष महोदय के अनुरोध की बजाय अपने माननीय मित्र की बात को तवज्जों नहीं दे सकता। महोदय, रिपोर्ट में उनके नाम दिए गए हैं। मेरे माननीय मित्र का अनुरोध कि नाम बताएँ दर्शाता है, कि उन्होंने रिपोर्ट नहीं पढ़ी है। यह दयनीय स्थिति है कि मतों के संकलन को पढ़ा नही गया। यह भी शोचनीय है कि निजी सदस्यों को सूचना एकत्र करने के लिए सारा श्रम व धन लगाना पड़े और तब वे इस सूचना को सदन के पास मुहैया कराएँ। किंतु सभी नाम रिकार्ड में हैं और यह किसी भी सदस्य के लिए अनावश्यक है कि उन तथ्यों के बारे में पूछे जो रिकार्ड में हैं। यह शोचनीय है कि मुझसे इसका हवाला मांगा गया है।

महोदय, मैं कह रहा था कि बंगाल में काफी विरोध है। यहाँ कलकत्ता, उच्च न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों जिनमें अब संघीय न्यायालय में पदासीन है, ने भी इसका विरोध किया है। उनके मत रिपोर्ट में भी हैं, और उन्हें डॉ. मित्तर की रिपोर्ट में भी संदर्भित किया गया है। इसी के साथ कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायधीश भी हैं। उनमें एक श्री एम.सी. चटर्जी हैं, और अब वे उच्च न्यायालय के जज हैं, वे भी इसके विरोध में हैं। डॉ. श्यामाप्रसाद इसी तरह इस मामले पर हिंदू महासभा ने भी अपने अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सहमति से साक्ष्य स्वरूप इस विधेयक का विरोध किया