भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 583

568 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

था। इसके पश्चात् डॉ. आर.बी. पॉल, जो एक विख्यात अंतर्राष्ट्रीय स्तर के न्यायाधीश हैं, ने भी इसका विरोध किया है। उन सबके मत हमारे समक्ष हैं। वस्तुतः बंगाल में इस प्रकार के मतों के परिप्रेक्ष्य में, मुझे आश्चर्य है कि बंगाल से ही एक सदस्य ने नामों के बारे में जानना चाहा है।

महोदय, अतः मैं इतना कहना चाहता हूँ कि विधेयक जनता की रायशुमारी के लिए जनता के पास जाना चाहिए। यदि हिंदू मत इसके विरोध में हैं तो क्यों आप इसे कानून का दर्जा देना चाहते हैं जिसे उनके द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा है।

एक माननीय सदस्यः यह एक तानाशाही है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः हाँ, यह नितांत तानाशाही है। यहाँ भय है कि यदि इसे चुनाव से पहले जनता के समक्ष भेजा जाता है, तो मुमकिन है कि इससे मुश्किलें बढ़ेंगी। किंतु क्या आप जानते हैं कि कौन-सी जटिलताएं सामने आएंगी यदि इसे चुनाव से पूर्व पारित किया जाता है? निरक्षर जनता इससे बौखला जाएगी क्योंकि इस विधेयक में उनका जीवन बुरी तरह प्रभावित हो जाएगा। उनके लिए यह सरल नहीं होगा कि तानाशाही फरमान के तहत तुरंत उनके जीवन को बदल दें। रूस में भी लेनिन इतनी जल्दी या बिना संपर्क के कुछ नहीं करते थे जैसा कि हम रायशुमारी की घोर अवहेलना करते हुए ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं। रूस में जनमत के सम्मान की अपेक्षा की जाती है और उसका दावा किया जाता है। किंतु यहाँ ऐसा कुछ नहीं है। यह भय से उत्पन्न जनता के पास जाता है तो यह अस्वीकृत हो जाएगा। ऐसा मान लिया गया है कि जनता इसके पक्ष में है। यदि ऐसा है तो क्यों नहीं इसे कानूनी दर्जा देने के लिए जनता का सहयोग लिया जाता? महोदय, सामान्य रूप से यह हिंदुओं के लिए घातक है और यह महिलाओं के व्यापक हितों के लिए भी घातक है और सामान्यतः जन सामान्य के लिए भी घातक है। अतः इसका कोई अर्थ नहीं है कि अपने विचारों को अनिच्छुक जनता पर थौपा जाए। क्या यह व्यक्तिगत हित का मामला नहीं बन गया है कि कोई भी अपने मत को लागू कराने के लिए स्वतंत्र है। किंतु प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कानून मंत्री के तौर पर आना और अपने प्राधिकार को जनमत से ऊपर रखना कहाँ तक उचित है? क्या उनके लिए यह उचित और सही है कि जनमत को दर-किनार करें_ उसे अनदेखा करें, उसे उलझाएँ या उससे बचें? यह एक गलत तरीका है, एक उलझाने वाली प्रवृत्ति, जिसे प्रजातांत्रिक सरकार की किसी भी पद्धति में पसंद नहीं किया जाएगा। आप क्यों नहीं जनता के पास जाते यदि आपको लगता है कि कानून उनके पक्ष में है? क्या जनता के अपने विचार इतने पिछड़े हुए हैं कि वे निर्णय लेने में सक्षम नहीं होंगे? उनके लिए क्या सही है या क्या गलत है? यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि सिद्धांततः सही क्या है, बल्कि यह है कि सही परिस्थितियाँ क्या हैं और यह सब स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर है। कुछ प्रथाएँ अच्छी मानी जाती हैं और कुछ अच्छी नहीं मानी