भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 584

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जातीं, पर आप सभी व्यक्तियों को एक ही जामा पहना रहे हैं। क्या आप सभी व्यक्तियों को एक ही ढांचे में ढालने की कोशिश कर रहे हैं? क्या माननीय कानून मंत्री को प्रयास करना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति उन्हीं के जैसा समझदार और प्रभावी बन जाए? आप ‘असमानता’ को क्यों समाप्त करना चाहते है? ‘असमानता कोई बुराई नहीं है। यह प्रकृति में है कि विविधता में असमानता होती है। भारत एक बहुत महाद्वीपीय देश है और यह अपनी विशिष्टताओं के अनुसार विकसित हुआ है और प्रलोक प्रांत की अपनी एक अलग संस्कृति है। तो आप क्यों अपनी एक कलम के बल पर उनके सभी प्रकार के विचारों को समाप्त कर देना चाहते हो और सभी के लिए एक जैसा कानून बनाना चाहते हो?

हिंदू बड़े कानून-विद्वान नीति-निर्माता वे वस्तुतः हमारा ‘हिंदू कानून’ हमें देने वाले विशिष्टख्...,

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह केवल ‘उपसंहार’ है, न कि कोई तर्क!

श्री नजीरुद्दीन अहमदः उनमें सहनशीलता थी और वे अपने कानून बलपूर्वक लागू नहीं करते थे। ‘मनु स्मृति’ के अनुसार उन्होंने अपने कानून बलात् लागू नहीं किए थे। उन्होंने कहा था कि कानून प्रदेश के रीति-रीवाजों के तहत प्रवृत्त किए जाने चाहिए। जो कोई पढ़ेगा उसे ऐसा पाएगा और इसलिए, हिन्दू कानून विद्वान ऐसे किसी कानून को नहीं चाहते जो एक समान है। उनके कानून और उनकी सभ्यता के प्रचार-प्रसार की उनकी विधियाँ बलात न होकर वस्तुतः अभिप्रेरक होती थीं और उन्होंने पूर्वी स्वतंत्रता दे रखी थी। और मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूँ, कि संपूर्ण विवरण पढ़ने के बाद भी वे अपने कानून को उसके गुण-दोषों के आधार पर प्रचारित करने की अनुमति देते थे, कि बलपूर्वक। स्थानीय परंपराएं न केवल अब महत्वपूर्ण हिस्सा हैं अपितु मनु के समय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं और यही कारण है कि आज कई कानून अलग-अलग हैं। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार यह एक जैविक पद्धति है जिसके कारण मतभेद भी होते हैं। वस्तुतः विविधाएँ कोई बुराई नहीं है। हमारा देश कोई छोटा देश नहीं है। यह एक बड़ा देश है जहाँ महाद्वीपीय सभी विशेषताएँ हैं और इस विविधता को पर्याप्त तथ्यों एवं सजग विचारों के बिना भुलाया नहीं जाना चाहिए।

महोदय, श्री कॉमथ ने वर्तमान विधेयक को एक नई स्मृति, डॉ. अम्बेडकर की 138वीं स्मृति के रूप में तुलना की है। मेरा मानना है कि यह कोई स्मृति नहीं है, स्मृति को श्रुति से शुरू होती है। यह तो एक दिखावा मात्र है कि यह श्रुतियों के सिद्धांतों जैसी है। यह एक विधेयक है, जो स्मृति नहीं है किंतु एक नया ‘वेद’ है। ( पं. लक्ष्मी कांत मैत्रेयः ‘‘यह ‘विस्मृति’ है।’’) यह विस्मृति भी है क्योंकि इसमें अतीत का विस्मण हैं। राउ समिति की रिपोर्ट के बचाव में डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं अपनी कलम की नोक से भी पवित्र कानून और परंपराएँ, नियम, विधियाँ, निर्णय, प्रिवी परिषद के सिद्धांत त्याग दिए और वे सभी नष्ट हो गए हैं।