570 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यानी यह एक विस्मृति है जैसा पंडित मैत्रेय ने व्यंग्य स्वरूप कहा था। यह एक विस्मृति है यानी नितांत विस्मरण! यह एक नया वेद भी है। हमारे चार वेद हैंः सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, तथा अर्थवेद। मैं सोचता हूँ कि इन नए वेद को ‘डॉ. अम्बेडकर वेद’ पुकारना चाहिए। और यह पांचवां वेद पुराने चारों वेदों की अवहेलना करता है। और स्वयं को सबसे ऊपर मानता है। महोदय, अब मैं धन्यवाद करता हूँ।
ऽ पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः अध्यक्ष महोदय, हम कल से हिंदू संहिता विधेयक पर चर्चा कर रहे हैं। हमने इस पर फरवरी में भी चर्चा की थी। मैं इसके गुण-दोषों पर चर्चा करने से पहले यह बताना चाहता हूँ कि यह विधेयक काफी विवादास्पद प्रकृति का है जिसका उद्देश्य हिन्दू समाज की संरचना को ध्वस्त करना है। अतः रिकार्ड में मैं यह प्रस्तुत करना चाहता हूँ कि मेरा घोर विरोध यह है कि सरकार इस महत्वपूर्ण मामले का यह किस तरह अनुसरण कर रही है। जिससे हिंदू समाज के लिए जीवन व मृत्यु का प्रश्न उपस्थित हो गया है?
यह सुविदित है कि इस विधेयक को लगभग अंतिम दिन अर्थात् 9 अप्रैल, 1948 को सदन में शीघ्रता से प्रस्तुत किया गया था जबकि इस पर इस तरह की चर्चा नहीं की गई थी, जैसी कि सदन में सामान्य विधेयक की भी, सामान्य रूप से की जाती है। इसके अतिरिक्त, हमने पाया कि इस मामले पर निरंतर विचार किए जाने के बजाय सरकार की कामना है कि बजट सत्र के कारण समय की कमी होते हुए भी और इस सदन के माध्यम से विधेयक को पारित कर लिया जाए। अतः मैं सम्मानपूर्वक विनम्र निवेदन करता हूँ कि क्या सदन के लिए यह उचित है कि ऐसे महत्वपूर्ण मामले के मुल्यांकन में, आरंभ से ही विधेयक को प्रमुख स्थान नहीं दिया गया और गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया? तथापि, यह सरकार पर निर्भर है कि वह निर्णय लें। पर मैने महसूस किया है कि यह मेरा कर्तव्य है कि मैं सरकार को आगाह करूँ कि वह इस पर धैयपूर्वक विचार करे और ऐसे मामले में जल्दबाजी से काम न ले तथा इस विधेयक को हड़बड़ी में प्रस्तुत न करे। मैं पूछना चाहता हूँ, उस हिन्दू समाज का क्या होगा, जिस हिंदू समाज ने सदियों से चले आ रहे विदेशी हमलों और विदेशी शासन की मार झेली है? क्या उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाएगा यदि इन उपायों को संवैधानिक रूप से दे दिया जाएगा? मेरा कहना यह है कि इस अनावश्यक हड़बड़ी और जल्दबाजी के कारण के बारे में मेरे विद्वान मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद ने इंगित किया था, अब, कानून मंत्री जान गए होंगे कि हिंदुओं का जनमत मुल्यांकन से पर है। महोदय, मैं यहाँ यह कहने का भी साहस रखता हूँ कि जनमत इसके विरुद्ध है। इसका क्या मापदंड है
ऽसी.ए. (विधि.) डी., खंड 3, भाग II, 2 अप्रैल, 1949, पृष्ठ 2276-89