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कि जनमत इसके विरुद्ध या इसके पक्ष में है? इसका मात्र मापदंड यह भी हो सकता है कि मतों का बहुमत क्या है जिसे रिकार्ड में रखा गया हैं? मैं विनम्रतापूर्वक निवेदन करता हूँ कि राउ समिति द्वारा मतों के मूल्यांकन के बारे में मत यह था कि वे उनके प्रत्येक अनुच्छेद के विरुद्ध थे। अतः जनमत के ताजा अनुमान के बिना कानून मंत्री सहित प्रत्येक व्यक्ति के लिए यही माना जाएगा कि इस देश में इस विधेयक को जनमत का समर्थन प्राप्त है।
अब प्रश्न उठता है कि हिंदू कानून के संहिताकरण की क्या आवश्यकता है क्या उपयोगिता है? हिंदू कानून के संहिताकरण की मांग कौन कर रहा है? हम जानते हैं कि संहिताकरण केवल दो शर्तों के तहत अनिवार्य है। पहली शर्त यह है कि यदि किसी मुद्दे विशेष पर न्यायिक मतों में गंभीर टकराव है तो विधायिका के लिए यह अनिवार्य है कि संशयों में हस्तक्षेप और उनका स्पष्टीकरण करें। दूसरी शर्त यह है कि जनमत कानून में परिवर्तन करना चाहता है। ये केवल दो शर्तें ऐसी हैं जहाँ हिंदू कानून के संहिताकरण के प्रयास का औचित्य है। अतः मैं इस मामले विशेष में कहना यह चाहता हूँ कि यहाँ दोनों ही शर्तें नहीं है। जहाँ तक हिंदू कानून के मुख्य सिद्धांतों का संबंध हैं, मैं साहसपूर्वक कहता हूँ कि ये सुविदित और सुस्थापित हैं। हिंदू कानून की कई पुस्तकों में ये सिद्धांत स्मृतियों और आलेखों से लिए गए हैं जिन्हें मौखिक रूप से व्याख्ययित माना और प्रकाशित भी किया गया है। यह भी नितांत स्पष्ट है कि हिंदू कानून के प्रत्येक जटिल मुद्दों की स्पष्ट व्याख्या की जा चुकी है। इस विधेयक को प्रस्तुत किए जाने के दौरान कानून मंत्री ने कहा है कि हिंदू कानून के अनुसरण में हिंदू समाज या संयुक्त परिवार की विशेषताओं का न्यायिक प्रक्रिया के कारण क्षरण हुआ है किंतु क्या इसी से संहिताकरण का कोई औचित्य है। प्रीवी परिषद और उच्च न्यायालयों के न्यायिक मतों और निर्णयों से स्पष्ट हो गया है जो अब इस पर किसी भी संदेह की गुंजाइश नहीं है। चाहे संयुक्त हिंदू परिवार के उस कर्ता या प्रबंधक की शक्तियाँ हों, जब वह पिता न हो या चाहे संयुक्त हिंदू परिवार का कोई पिता, जब प्रबंधक के तौर पर अपने कार्यों एवं शक्तियों का निर्वहन करता हो किंतु कानून में उसके अधिकार और शक्तियों को परिभाषित किया जा चुका है।
धार्मिक दायित्वों के विवादित सिद्धांतों, जिन पर कई बार विभिन्न उच्च न्यायालयों और प्रिवी काउंसिल के बीच गंभीर टकराव होता था उनका भी निपटान कर दिया गया है। अब हम जानते हैं एक पुत्र के क्या कर्तव्य हैं और यह भी हम जानते हैं कि उसके पिता के दायित्वों के बदले में उसकी जिम्मेदारी की सीमा क्या है। इसी प्रकार विवाह, इत्यादि के संबंध में भी हिंदू कानून बिल्कुल स्पष्ट है। फिर प्रश्न उठता है कि क्या देश में कोई ऐसा मत और बहुतायत में जनमत है, जिसके लिए सरकार को हिंदू कानून तथा संहिताकरण अपेक्षित है? मेरा विनम्र कथन है कि ऐसा कुछ भी नहीं है और हिंदू कानून के संहिताकरण के प्रयास के लिए कोई औचित्य ही नहीं है।