भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 587

572 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जहाँ तक संहिताकरण के इतिहास का प्रश्न है, तो यह प्रयास पहली बार नहीं किया जा रहा है। मैं सविनय सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि हिंदू कानून के संहिताकरण के लिए ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न प्रयास किए गए थे और प्रत्येक ऐसे अवसर पर यह मामला सुदृढ़ धारणों से स्थगित भी किया गया था। काफी पहले 1833 में एक आयोग रॉयल चार्टर द्वारा स्थापित किया गया थ। अनंतर 1853 में एक विधि आयोग भी बनाया गया था। 1856 में प्रकाशित इन आयोगों की रिपोर्ट में हिंदू कानून को संहिताकरण के प्रस्ताव को इस कारण से अस्वीकृत कर दिया गया था कि यह एक व्यर्थ का प्रयास है और इससे हिंदू कानून की प्रगति व विकास बाधित हो जाएँगे। इसी प्रकार 1861 में और पुनः 1921 में, पहले मामले में भारत संघ के सचिव और दूसरे मामले में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट की मंजूरी के साथ गवर्नर जनरल ने विधि आयोग स्थापित किए थे। उनके संहिताकरण के मुद्दे के निर्णय विधि आयोग के निष्कर्षों के समानुरूप ही थे। बाद में 23 मार्च, 1921 को इस सदन के एक विशिष्ट सदस्य ने हिंदू कानून के संहिताकरण के लिए एक आयोग के गठन का एक गैर-सरकारी प्रस्ताव प्रस्तावित किया था। जब इस सदन में इस प्रस्ताव पर चर्चा की गई, तो विधि विभाग हिंदू कानून के एक बहुत विख्यात विद्वान एवं सम्मानीय न्यायाधीश श्री डॉ. तेज बहादुर सप्रू के अधीन था। तब वहाँ संहिताकरण अनिवार्य है या नहीं, आवश्यक है या नहीं, वह हिंदूसमाज के लिए बेहतर होगा या नहीं, से संबंधित सभी मुद्दों पर गर्म-जोशी से चर्चा की गई थी। मैं इस सदन और माननीय कानून मंत्री का ध्यान उस उत्तर की ओर दिलाना चाहता हूँ, जिसे सर टी.बी. सप्रू द्वारा भारत सरकार की ओर से दिया गया था। वे स्वयं हिंदू कानून के ज्ञाता थे। तथापि उन्होंने इंगित किया कि समाज के व्यक्तिगत कानून का संहिताकरण कोई सरल मामला नहीं है, अर्थात् यह एक विस्मयकारी कार्य होगा, जहाँ सदियों से श्रेष्ठ कानून ज्ञाताओं का श्रेष्ठ ज्ञान अपेक्षित होगा। उन्होंने सदन का ध्यान जर्मन संहिता की ओर आकर्षित कराया जिसे 1834 से 1896 के 50 वर्षों के अनथक परिश्रम के साथ ही प्रस्ताविक एवं संहिताबद्ध किया जा सका था और तथ्य भी यही है कि कम से कम तीन आयोगों द्वारा फिर उन्होंने इंगित किया कि 1896 तक भी, वह जर्मन संहिता अंतिम प्रारूप में नहीं आ पाई और वह विख्यात जर्मन न्यायधीशों के दो पक्षों जिनमें एक का प्रतिनिधितव सेवोग्री और दूसरे का प्रतिनिधित्व थेबाउट कर रहे थे, के मध्य संहिताकरण के पक्ष और विपक्ष में एक लगातार कड़ी चर्चा के बाद ही, 4 वर्षों बाद, यह कार्य पूरा हो पाया था। अतः, 1900 में, लगभग 50 वर्षों के निरंतर परिश्रम के बाद ही वह संहिता पूरी हुई और इम्पीरियल जर्मन सरकार द्वारा अनुमोदित हो पाई। महोदय, ऐसा ही, देश के श्रेष्ठ विधि ज्ञाताओं के कई वर्षों के निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप योरूपीय महाद्वीप की स्विस संहिता के साथ भी हुआ और संहिताएँ भी इसी प्रकार पूरी हो पाई थीं। उन क्षेत्रों और उनकी स्थितियों की तुलना यदि भारत की स्थितियों या