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भारत के प्राचीन इतिहास तथा प्राचीन काल से अब तक चली आ रही हिंदू कानून के विकास में विधि की निरंतर धाराओं से की जाए, तो मेरा कथन है कि हिंदू कानून का संहिताकरण एक व्यर्थ का प्रयास है। यह व्यर्थ का प्रयास इसलिए होगा क्योंकि इसमें हिंदूओं के व्यक्तिगत कानून का संहिताकरण किया जाएगा। यहाँ मैं सविनय पूछता हूँ कि आखिर इस कानून का स्रोत क्या है? यह स्पष्ट है कि किसी मानव का इसमें हाथ नहीं है अर्थात् किसी मानवी शक्ति ने हिंदू कानून को प्रस्थापित करने का प्रयास नहीं था। इस कानून की स्वीकृति के पीछे कोई प्रातासंपन्न शक्ति भी कहीं थी, अपितु वह अपेक्षाओं की नैतिक स्वीकृति और साधू-संतों के गहन सोच का परिणाम था। इस तरह इसके मूल को खोजना कठिन है और स्मृतियां जिनकी संख्या 138 बताई गई है, का उद्देश्य भी कानून बनाना नहीं था। वे स्मृतियाँ वेद पर आधारित थीं और हम जानते हैं कि ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम पुस्तक है। भारत के दो मुख्य ग्रंथों के विद्वान-लेखक विज्ञनेशवर तथा जिमुता वाहना द्वारा भी हिंदू कानून के संहिताकरण या समाज के लिए किसी नए कानून सृजित करने का प्रयास नहीं किया गया। उनकी अपनी टीकाएँ भी केवल स्मृतियों पर आधारित हैं। ब्रिटिश और मुस्लिम शासन के लम्बे कार्यकालों के दौरान भी जो कुछ किया गया है वह भी हिंदू कानून के सुपरिचित सिद्धांतों की साधारण व्याख्या मात्र है। तो अब, हिंदू कानून के किसी संहिताकरण की आवश्यकता क्यों हैं? यदि जर्मन और स्विस देशों ने जो भारत की तुलना में कम महत्वपूर्ण हैं-अपने सम्बन्धों के नियंत्रण हेतु एक संतोषजनक संहिता बनाने के लिए 50 से 60 वर्ष लिए, तो हम भारत में जहाँ हिंदू कानून का मूल स्रोत रहस्य में छिपा है, के कानून के संहिताकरण का प्रयास क्यों किया जाए? हमें बताया गया है कि ऐसा इस विविधता वाले देश में एकरूपता लाने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए और अन्य कारण यह भी कि हिंदू समाज में महिलाएँ पुरुषों के हाथों लम्बे समय से प्रताडि़त व पीडि़त होती रही हैं, इसलिए इन्हें उनसे मुक्ति दिलाई जाए। एकरूपता के संबंध में मेरा कथन है कि वह मौजूदा परिप्रेक्ष्य में प्राप्त नहीं की जा सकती और न ही अन्य किसी भी सूरत में ऐसा होना संभव है।
इस दौरान अध्यक्ष महोदय ने अपनी कुर्सी छोड़ी जिसे माननीय उपाध्यक्ष महोदय (श्री एम.अनंथसयनम आयंर) ने ग्रहण किया।
उत्तराधिकार के कानून के संबंध में भी, या ऐसे मामलों में जहाँ ज्येष्ठा के अधिकार का नियम परंपरा से मौजूद है अथवा अनुदानों या इनामों के मामलों में कहा गया है कि इस विधेयक में निर्धारित उत्तराधिकार के नियम लागू नहीं होंगे।
प्रवर, धारा 7 में हालांकि सपिण्डों के मध्य विवाह वर्जित है, यह कहा गया है कि ऐसा स्थानीय रिवाजों के अधीन हो सकता है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है जहाँ यह परंपराओं द्वारा स्वीकार्य है। तथापि एकरूपता का भूत इस विधेयक के