574 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मसौदाकार को अभी भी सताए हुए हैं, फिर भी वहाँ महिलाओं की दासता से ‘व्यक्ति मुक्ति’ का कोई उपाय नहीं है। मेरा कथन है कि जो हिंदू कानून और हिंदूसमाज में महिला के उचित स्थान देने के इच्छुक हैं, उन्हें पश्चिम की नशरों के बजाए हमारी अपनी सभ्यता की नजरों से इस मामले को देखना चाहिए। हमें यह भी अवश्य जानना चाहिए कि हमारे अपने विधिवेता इन बहुत कठिन और जटिल प्रश्नों को किस तरह व्याखायित करते है। पूर्वी और पश्चिम देशों में इन प्रश्नों से संबंधित दृष्टिकोण एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत है। हमारा विश्वास है कि हमारे जीवन का हमारे अतीत से संबंध है और हमारे भावी जीवन से भी संबंध होगा, इसलिए हमारे कानून के नियम विशेष परिवेश के अनुसार बनाए जाएँ। यही कारण है कि हमारे साधु-संतों ने इन मामलों पर हिंदू समाज की समग्र बेहतरी के अनुसार अपना दृष्टिकोण रखा था। हमें अपने कानून बनाने के प्रयास में अपने विधिवेताओं द्वारा पद्धति विशेष में कानून बनाने के लिए प्रेरित आदर्शों के अनुरूप ही अपना दृष्टिकोण रखना चाहिए। जब तक हम इस विषय में कुछ नहीं करते हम अपने मूल्यों का महत्व भी नहीं समझ सकते हैं।
महोदय, मैं बुरा नहीं मानूँगा यदि कानून मंत्री घोषित कर दें कि यह विधेयक अपने गुण-दोषों के अनुसार चलेगा और या हिंदू समाज के उन आदर्शों के अनुसार रहेगा, जैसे कि वे अब मौजूद हैं। किंतु जिस बात ने मुझे दुःख पहुँचाया है वह यह है कि उन्होंने कहा कि इसके उपाबंध हमारे स्वीकृत सिद्धांतों के अनुरूप है। यह सर्वविदित है कि शैतान भी बाइबल से उदाहरण दे सकता है। मेरा कथन यह है कि इस विधेयक का प्रत्येक उपखण्ड-चाहे वे विवाह या तलाक, या फिर दत्तकग्रहण या उत्तराधिकार से संबंधित हो-हमारे हिंदू कानून के मौलिक सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। तदनुसार, इसका परिणायम भी इतना सुखद नहीं होगा। तब हिंदू समाज का प्रत्येक घर एक नरक में तब्दील हो जाएगा जहाँ बहन व भाई, पति और पत्नी तथा बच्चों और उनके पिता के मध्य झगड़े होने लगेंगे। अतः इस कानून द्वारा हिंदू समाज की मौलिकता समाप्त हो जाएगी। यही चिन्ता का विषय है अतः इस पर जनमत संग्रह या मत-संग्रह अवश्य कराना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि क्या देश में जनता का मत इस कार्यवाही के पक्ष में है या इसके विरोध में है।
मेरा कहना था कि हिंदू कानून के संहिताकरण की कोई आवश्यकता नहीं थी। तब प्रश्न यह उठता है कि क्या इस कानन के बनने और लागू करने से वांछित एकरूपता प्राप्त हो जाएगी? हमारा पिछले संवैधानिक कानूनों का अनुभव क्या है? भारत सरकार द्वारा 1923 में एक सिविल जस्टिस समिति का गठन किया था और एक समिति ने विभिन्न संविधियों के अध्ययन के उपरांत यह संस्तुति की थी कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, संविदा अधिनियम और साक्ष्य कानून को संशोधित किया जाए और इसकी