भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 590

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समीक्षा शीघ्रातिशीघ्र विधायिका के पास भोजा जाए। क्या विधायिका ने इसके लिए समय निकाला है? परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह है कि कानून उपबंधों के अनुसार निर्देशित किया जा रहा है और प्राधिकारी ने स्वयं ही इसकी उपयोगिता को कमतर कर दिया है। यदि हिंदू संहिता को संविधि पुस्तक में लाया जाता है, तो उसमें भी जो शर्तें रहेंगी उनसे यह एक कठोर संहिता बन जाएगी, जिस पर जनता के अधिकार निर्भर हो जाएँगे। इससे हिंदू कानून का महत्व इसका लचीलापन, इसकी वर्तमान स्थिति में सुसंगतता का हनन हो जाएगा। यह मात्र ठूँठ बन कर रह जाएगा। क्या मैं जान सकता हूँ कि क्या हिंदू कानून के संहिताकरण द्वारा मतभेदों और विवादों को कम किया जा सकेगा? और मैं कहने का साहस रखता हूँ कि ऐसा नहीं होगा। पिछले विधायकों की विभिन्न अवस्थाओं के हमारे अनुभव भी यही कहते हैं। अतः इससे मेरे कथन को समर्थन मिल जाता है।

उदाहरणार्थ हिंदू कानून पुनर्विवाह अधिनियम, 1871 में लागू हुआ था। महोदय, अब यह विधायिका का एक बहुत ही सरल खंड है, किंतु क्या इस अधिनियम के विभिन्न उपबंधों को बनाए रखने से संबंधित मतों पर कोई मतैक्य हुआ है?

श्रीमती जी. दुर्गाबाई (मद्रासः सामान्य)ः क्या आप विधवा विवाह अधिनियम का भी विरोध कर रहे हैं?

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः मुझे आशा है कि मेरे मित्र मुझे धैयपूर्वक सुनेंगे। हमें विपक्ष के मतों के लिए थोड़ी सहनशीलता और धैर्य भी रखना और सीखना चाहिए। मेरा संकेत था कि मात्र अधिनियम द्वारा एकरूपता और मतभेद का समाधान संभव नहीं है। इस हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1872 के उपबंधों और व्याख्या के बावजूद हमने पाया कि अनुच्छेद 2 के बनाने पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के मध्य गंभीर टकराव देखा गया है। प्रश्न उठता है कि कोई महिला पारंपरिक रिवाजों के अनुसार पुनर्विवाह करती है तो क्या अपने पति की सम्पत्ति में उसका अधिकार समाप्त हो जाएगा? इस मामले पर हमारे पास इलाहाबाद उच्च न्यायालय और अवध मुख्य न्यायालय का मत है कि चूँकि महिला ने रीति-रिवाजों के मुताबिक पुनर्विवाह किया है इसलिए पहले पति की सम्पत्ति में उसका अधिकार बरकरार रहेगा। एक अन्य उच्च न्यायालय ने अन्य मत व्यक्त किया है। इसी तरह, इस अधिनियम के सरल शब्छ ‘‘बहन’’ की व्याख्या के संबंध में भी गंभीर मतभेद हैं। कुछ उच्च न्यायालय कहते हैं कि ‘बहन’ में ‘हॉफ सिस्टर (सौतेली बहन) शामिल नहीं है। जबकि नागपुर उच्च न्यायालय ने इस शब्द पर व्यापक विचार के बाद निष्कर्ष निकाला है उसे भी शामिल किया जाए। उपरोक्त के संबंध में मेरा अभिकथन यह है कि हिंदू कानून प्रक्रिया में आज जो कठिनाई है वह मात्र इस तथ्य से समाप्त नहीं हो जाएंगी कि यहाँ हिन्दू संहिता विधेयक आ जाएगा।