44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्रीमती जी दुर्गाचार्यः यह केवल वैकल्पिक स्थिति है।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः मैंने उत्तर दे दिया है। वह वैकल्पिक हो सकता है, परन्तु क्या इससे वह मामला समाप्त हो जाता है? ‘हिंदू संहिता’ कहती है कि पांच शर्तें हैं, जब विवाह होता है अन्यथा विवाह करने की अनुमति नहीं होगी। शब्द इस प्रकार हैंµफ्सांस्कारिक विवाह से संबंधित शर्तेंय् इसका अर्थ है सैद्धान्तिक मामलों में जैसे ही इनमें से एक प्रावधान का उल्लंघन होता है, आप कानून को अनुमति देते हैं तथा अपने को बचाने के लिए कानून की दरारों से सुरक्षित रह सकें। जहां तक सपिण्ड संबंध के निषेध का संबंध है, मैं विनम्रतापूर्वक यह निवेदन करता हूँ कि कठिनाई यह है कि उस कानून की एकरूपता, जिसके लिए हमारा लक्ष्य है, उसे भारत जैसे देश में प्राप्त करना बहुत कठिन है। यह कहा जा चुका है कि इस प्रकार की एकरूपता ला पाना चमत्कार ही होगा। मैं डॉ. अम्बेडकर को बधाई देता हूँ कि उन्होंने इस प्रकार चमत्कार का कार्य किया है और मैं इस चमत्कार के लिए उनका समर्थक हूँ कि यह कार्य सम्पन्न किया जाए। परन्तु जब ऐसे स्थानीय मामलों में वैधानिक कठिनाइयां होती हैं जिनमें वर्तमान स्थिति से उस स्थिति तक जिससे हम कानून बनाकर देखना चाहते हैं। बहुत और बहुत हिंसक होता है। मैं सदन से पूछना चाहूँगा कि इन मामलों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाए कि यह टकराव बचाया जा सके।
अब, श्रीमान मैं पंजाब के एक ऐसे स्थान से आता हूँ, जहां गांवों पर गांव हैं, समान गोत्र के तथा वे यह विश्वास करते हैं कि वे एक ही पूर्वज की संतान हैं। आप इस सपिण्ड संबंध को जानते हैं, जिसमें प्रतिबंध पूर्व की तीन अथवा पांच पीढि़यों तक ही होता है। फिर भी जहां तक कि उन लोगों का संबंध है। मैं नहीं चाहता यह कहना कि आप इसे और अधिक प्रसार दें। ठीक इसी तरह यह अस्वीकार्य होगा और इससे ऐसी बात पैदा हो, जिसके साथ हम कभी भी समझौता नहीं कर सकते। यह एक असंभव स्थिति है, जहां तक हमारा संबंध है और यदि आप इसकी अनुमति देते हैं तो आप हमारी सामाजिक प्रणाली की जड़ों को ही काट रहे हैं जैसा कि पंजाब में बहुत समय से लोग इसको स्वीकार रहे हैं। वैसी ही मेरी भावना सम्पूर्ण भारत के लिए भी है। निःसंदेह मैं शेष भारत के लिए कुछ नहीं कहता, क्योंकि यहां कुछ ऐसे बंधु हैं जो इस पर सवाल उठा सकते हैं। मेरा विचार है कि संपूर्ण भारत में इसी प्रकार की स्थिति होनी चाहिए। ठीक है इसके बारे में मैं हठधर्मी नहीं हूँ। परन्तु यह बहुत गलत नियम है जिसे हम कानून बना रहे हैं और धारा VII की ऐसी आवश्यकताएं जो विवाह करने वाले दम्पत्ति पर, जहां तक पंजीकृत सांस्कारिक विवाह का संबंध है सपण्डि न होने की शर्त लगाती है, उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। जहां तक शारदा एक्ट की सीमा है, उसके अनुसार हिंदू कानून और हमारी धारणाओं के अनुसार तक बार सम्पन्न हुआ विवाह सदैव अविघटनकारी होता है। हम इस नियम से हट रहे हैं, जहां तक हम संहिताओं अथवा रिवाजों द्वारा विवाह के विच्छेद की व्यवस्था