45
कर रहे हैं। अन्यथा जब नियम III रद्द किया गया, तो आप व्यक्ति को अभियोगी बना सकते हैं और उसे जेल भेज सकते हैं। मैंने इस सदन के सामने विधेयक के माध्यम से निवेदन किया है कि जब व्यक्ति की समुचित आयु न है और विवाह कर दिया जाता है, तो उस पर जुर्माना किए जाने के बजाय उसे जेल भेज देना चाहिए और कानून का कोई ऐसा उपयोग विवेकाधीन नहीं होना चाहिए कि उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाये। समस्त देश शारदा एक्ट के विरुद्ध था और वर्तमान प्रावधान दिखाता है कि यदि नियम III का अनुसरण किया जाता है, तो विवाह हो जाएगा। यह उन परिहार्य सिद्धांतों के विरुद्ध है जिन्हें हमने 20 वर्ष से अधिक समय से स्वीकार किया हुआ है।
जहां तक हिंदू संहिता के मुख्य प्रावधानों का संबंध है, मैंने उनका सारांश में उल्लेख कर दिया है, इस उद्देश्य से कि उन्हें सदन के सामने लाया जा सके और चूंकि मेरी यह भावना है कि यह विधेयक रुकने नहीं जा रहा है, मैं उन मामलों के बारे में बताऊंगा जिनमें खंड प्रति खंड विचार किया जाएगा।
निष्कर्षतः मैं यह कहना चाहता हूँ कि जहां तक इस सदन का संबंध है, यह ठीक होगा कि या तो इस विधेयक को व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए भेज दिया जाए क्योंकि ऐसी स्थिति में कुछ भी हानि नहीं होगी। बल्कि तथ्य यह है कि हमें बहुत कुछ लाभ ही होगा। जनता का परामर्श मिल जाएगा और जनता यह महसूस नहीं करेगी कि उसकी अवहेलना कर दी गई है। वास्तव में यह तथ्य है कि इसमें कई संशोधन उस समय किए गए हैं जब यह विधेयक प्रवर समिति के विचार के बाद सदन में आया यहां तक प्रवर समिति के पूर्व लोग सामान्य रूप से इस बारे में कुछ नहीं जानते थे। फिर भी जो कुछ कहा गया है, इसके बावजूद, मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि लोग जानते हैं इस बारे में भी। डॉ. अम्बेडकर ने दो महानुभावों का उल्लेख किया है जिन्होंने इस रिपोर्ट का मसौदा तैयार किया है और यह बताया है कि दोनों ही व्यक्ति भले व्यक्ति थे और ऐसे नहीं थे कि उन्हें उनके विचारों में अत्यधिक प्रगतिशील माना जा सके। मेरे पास उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के कई अभिमत हैं और प्रतिदिन अधिकाधिक मत प्राप्त हो रहे हैं। वे सभी लोग इसके विरुद्ध हैं। मैं यहाँ वे साक्ष्य पढ़ाना नहीं चाहता जो हिंदू कानून समिति की प्रतिवेदन में प्रकाशित हुए हैं। मैं आपकी अनुमति से इस प्रतिवेदन के पृष्ठ 13 का संदर्भ देना चाहूँगा, जहां एक महिला का साक्ष्य है। वह महिला फतेहचंद कॉलेज फॉर वूमेन की प्रिंसिपल कुमारी सुब्रुल हैं। उन्होंने कहा हैःµ
फ्अविवाहित बेटी जो विवाह करने के योग्य न हो अथवा जिसने विवाह न करने का इरादा कर लिया हो, उसे सम्पत्ति में उतना ही भाग मिलना चाहिए जितना पुत्र को तथा उसके भी वही दायित्व होने चाहिए जैसे कि पुत्र के। पर विवाहित बेटी का सम्पत्ति में कोई भाग नहीं होना चाहिए। यदि अविवाहिता बेटी का विवाह हो जाता है, तो उसका भाग उसके भाइयों को वापस मिल जाना चाहिए।य्