भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 591

576 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री.एल. कृष्णास्वामी भारतीः क्या आपका आशय यह हे कि विरोध की अनुमति दी जाए?

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः मेरा यही कहना है कि यदि यह विधयेक अधिनियम बन भी जाता है तो विरोधा रहेगा और यह उच्च न्यायालय पर निर्भर होगा कि वह इसके विभिन्न उपबंधों की विभिन्न तरीकों से व्याख्या करें। हिंदू कानून से संबंधित विभिन्न मतों और विविध मुद्दों का स्वतः समाधान नहीं होगा, क्योंकि यह उच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालयों पर निर्भर होगा कि किसी उपबंध विशेष पर अपनी व्याख्या करें। अतः विवाद अवश्य उभरेंगे, जैसा कि हमारे पिछले विधायी कानूनों में भी देखा गया है। अस्तु मेरी सविनय याचना है कि हिंदू कानून का संहिताकरण करना एक बेकार और व्यर्थ का प्रयास है और इस दिशा में किए गए किसी भी प्रयास से हिंदू कानून की गतिशीलता, इसका लचीलापन तथा इसका महतव कम हो जाएगा। इसलिए ‘‘मौजूदा परिप्रेक्ष्य में अतिशय कल्पनाशील होने की सलाह दी जा सकती हैं।

मेरा अगली बात भी बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी तरह मौजूदा विधेयक का उद्गम हुआ है और क्या जिस परिस्थिति में यह पनपा है, उस पर आगे भी अनुसरण करने का कोई औचित्य है? मैं सविनय आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि 1941 में हिंदू कानून समिति का गठन किया गया था और उसके संभागों द्वारा हिंदू कानून के संहिताकरण के प्रश्न पर विचार किया गया था और उस समिति ने विधेयक भी तैयार किए थे। एक विधेयक हिंदुओं के मौखिक इच्छा उत्तराधिकार और दूसरा विवाह संबंधी कानून का था। जब ये दो विधेयक विधायिका के समक्ष आए, तो दोनों विधायिकाओं (उस समय हमारी विधायिका द्विसदन आधारितथी) की संयुक्त बैठक बुलाई गई थी और यह निर्णय लिया गया था कि यह बेहतर होगा कि हिंदू कानून, संभागों के बजाए एक संपूर्ण भाग में अधिनियमित किया जाए और इस उद्देश्य से मौजूदा राउ समिति अपने अस्तित्व में आई।

महोदाय, अब जब एक महिला सदस्य ने सदन को संबोधित किया है बेशक एक उत्साही महिला ने, जो इसके पक्ष में हैं तो उन्होंने कहा है कि यह विधेयक कई वर्षों से देश के सामने रहा है यानी लगभग 10 वर्षों से और राउ समिति ने इस बारे में हजारों साक्षियों की जांच की है और देश का व्यापक दौरा भी किया है। सविनय कहता हूँ कि उक्त महिला द्वारा दी गई घोषणा में कोई सच्चाई नहीं थीं, क्योंकि हमने समिति के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच की थी। इतने थोड़े साक्ष्यों का महत्व ही क्या था? 20 जनवरी, 1949 को अस्तित्व में राउ समिति ने एक विधेयक प्रस्तावित किया था, जिसे कुछ चुनिंदा और प्रख्यात अधिवक्ताओं की राय के लिए परिचालित किया गया था। उनकी राय प्राप्त होने के बाद, समिति ने निर्णय लिया था कि जिस मसौदे को उन्होंने