भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 592

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मूल रूप से तैयार किया था इसे संपूर्ण भारत में परिचालित किया जाए। तब विधेयक भारतीय भाषाओं में अनुदित किया गया और उसकी लगभग 6000 प्रतियाँ वितरित की गई थीं। 5 अगस्त, 1944 को उस पर मत आमंत्रित किए गए थे और मत प्राप्ति के बाद समिति ने देश का दौरा भी किया। मैं सदन को बताना चाहता हूँ उस समिति ने देश का दौरा किया था। लेकिन वह दौरा कुछ प्रांतों के प्रमुख नगरों और शहरों तक सीमित था और जहाँ तक मुझे स्मरण है वह दौरा एक दर्जन से अधिक शहरों का नहीं था। जैसे इलाहाबाद, बम्बई, कलकत्ता, पूना, पटना, लाहौर आदि। तो क्या यह समिति का एक व्यापक दौरा था? इन कुछ प्रमुख नगरों और शहरों की जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या की तुलना में कितनी है? क्या किसी भी माध्यम द्वारा इन शहरों में साक्षियों की जांच करने के उद्देश्य से समिति द्वारा किये गये दौरे से इस विधेयक पर देश की वास्तविक सम्मति का कोई संकेत मिलता है।

तब रिकार्ड किए गए साक्ष्यों की सीमा कितनी थी? आइए देखें। उस पर कुल 121 साक्षियों और 201 संस्थाओं के लगभग 257 व्यक्तियों द्वारा ही मत व्यक्त किए गए थे। यही कुल साक्ष्य थे। अतः क्या मैं एक अति प्रासंगिक प्रश्न पूछने का साहस कर सकता हूँ? देश की विशालता के मद्देनजर और इस तथ्य पर विचार करते हुए कि वास्तविक भारत के हिंदू शहरों में नहीं अपितु गांवों में रहते हैं, क्या कल्पना के स्तर पर भी यह साक्ष्य पर्याप्त है? उनमें जो कृषक हैं, वे जनसंख्या के 90 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस विशाल देश और विभिन्न प्रांतों में व्याप्त विभिन्न मतभेदों के मद्देनजर कल्पना के स्तर पर भी क्या समिति द्वारा साक्ष्यों की जांच को पर्याप्त और उपयुक्त माना जा सकता है। मैं सम्मानपूर्वक कहना चाहता हूँ। ऐसा संभव नहीं है।

आइए, इस साक्ष्य के परिणाम का कुछ और विश्लेषण कर लें। मेरा कहना है कि प्रत्येक मुद्दा, जो मौजूदा संहिता का आधार है, से संबंधित मत मुख्यतः और पूर्णतः किसी भी परिवर्तन के विरोध में ही था। उदाहरणार्थ, वह मौलिक सिद्धांत देखें जो इस विधेयक के चारों भागों में प्रतिस्थापित हैं। वह है पुत्रों, पुत्रियों, विधवाओं, आदि का समान उत्तराधिकार।

माननीय उपाध्यक्षः मौजूदा कानून के मुताबिक भी एक विधवा समान उत्तराधिकारी है।

श्री. एल. कृष्णास्वामी भारतीः फिर भी वे अब इसका विरोध कर रहे हैं। शायद वे इसे निरस्त करना चाहते हैं।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः पुत्र के साथ पुत्री के समान उत्तराधिकार के प्रस्ताव के पक्ष में केवल 78 और इसके विरोध में 215 साक्षी थे। विधवा की सीमित