भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 594

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अगली बात यह है कि यदि यह मान भी लिया जाए कि जनमत निर्णायक की भूमिका नहीं निभा सकता, तो इस मौजूदा विधायिका में ही इसे कानून का रूप दिये जाने की क्या आवश्यकता है? मैंने पहले ही इंगित किया था और मैं इस बहस की पुनरावृत्ति नहीं चाहूँगा, किंतु मैं सविनय कहना चाहता हूँ कि मौजूदा विधायिका का लक्ष्य संविधान का गठन करना है या फिर तात्कालिन मामलों से संबंधित वे कानून बनाना है जिनके लिए कानूनी प्रक्रिया अनिवार्य है। अतः कल्पना के किसी भी दायरे में भी यह मुद्दा नहीं आ सकता कि हिंदू संहिता विधेयक एक ऐसा कानून है, जिसे सरकार को जरूर बनाना चाहिए, चाहे देश की जनता इसके विरोध में ही क्यों न हो।

अब मैं इस विधेयक में समाहित विभिन्न प्रावधानों की जांच और समीक्षा की कार्यवाही करता हूँ। जैसी मैंने टिप्पणी की थी, मैंने महसूस किया है और मैं सत्यनिष्ठा से महसूस करता हूँ कि तत्कालीन प्रावधानों की मौलिकताएं जिन्हें इस विधेयक में समाहित किया गया है वे हिंदू समाज के अस्तित्व के लिए खतरनाक हैं, और यही हमारे साधू-संतों ने भी कहा है। अतः यह मेरा कष्टदायक कर्तव्य है कि इसका उपबंधों के आधार पर कड़ा विरोध करूँ। यहाँ प्रश्न उठता है कि इस विधेयक के माध्यम से हिन्दू समाज के बारे में कौन से मूल परिवर्तन किए जाने हैं और वे अपेक्षित परिवर्तन कहाँ तक हिंदू विचारधारा और आदर्शों के अनुरूप हैं। अतः मेरा एक सादर सुझाव है कि इस हिंदू संहिता को इस्लामिक संहिता की भांति तैयार कर लिया जाए!

श्री ए. करुणाकार मेनन (मद्रासः सामान्य)ः यही धारणा है कि हमारे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद इसका विरोध कर रहे हैं।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः बेशक, यह टिप्पणी मुझ पर लागू नहीं होती। मैं इस पर विद्वान सदस्यों की भांति ही उत्सुकता महसूस कर रहा हूँ। महोदय, अब दूसरा प्रश्न। यह ‘‘विवाह और तलाक’’ शीर्षक के अंतर्गत द्वितीय भाग से संबंधित है। इसकी धाराएँ 5 से 51 में समाहित की गई हैं। आइए देखें कि इस विधेयक के उपबंधों के अधीन विवाह के प्रकार किस प्रकार से विवाह की हिंदू अवधारणा के अनुरूप है। ये मेरा कथन है कि इस विधेयक की धारा 7 में सांस्कारिक विवाह का जो उपबंध है, वह हिंदू विवाह की अवधारणा एवं आदर्श की तुलना में बिल्कुल अलग है। ये मात्र छलावा है कि इसमें विवाह की वास्तविकता को छिपाया गया है। अन्यथा धारा 10 और 21 तक के उपबंधों का समावेश वहाँ नहीं किया जाता। हिंदुओं के लिए और मैं सोचता हूँ कि इस मुद्दे पर कोई विवाद नहीं हो सकता-और इस विषय पर दो मत भी नहीं हैं। निःसंदेह यदि हम हिंदू विचारधारा और आदर्शों को निशाना बनाते है, यदि हमें उन्हें त्याग देने की मंशा है, तब यह एक अलग मामला है। एक हिंदू के लिए विवाह सांस्कारिक होता है और यह भंग नहीं किया जा सकता। यह दंपत्ति के मध्य एक धार्मिक