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जाता तो वह वैध विवाह नहीं है। अतः अनुच्देद 6, 7, 10 एवं 21 कहता है कि कोई विवाह प्रमाणपत्र-रजिस्टर में विवाहित दंपत्ति द्वारा पंजीकृत न कराने पर अवैध माना जाएगा। मैं सम्मानपूर्वक पूछना चाहता हूँ कि इस प्रकार के प्रावधान से किस तरह के विधायी परिणाम आ सकते हैं। वे हिंदू समाज के मूल आदर्शों और शास्त्रों के व्यादेशों के प्रतिकूल हैं, जिनमें विवाह को अटूट बंधन माना गया है और उसे समाप्त नहीं किया जा सकता? और क्या यदि कोई विवाहित दंपत्ति अनजाने में इस आशय की प्रविष्टी प्रमाण-पत्र रजिस्टर में नहीं करता, तो क्या उसका विवाह भी अवैध हो जाएगा?
अब इस विधेयक में अगले महत्वपूर्ण प्रावधान अर्थात् तलाक के प्रावधान पर आते हैं। वहाँ पिछली परंपराओं के बारे में प्रश्न उठाया गया है और माननीय कानून मंत्री द्वारा नारद एवं पराशर स्मृतियों का हवाला यह सिद्ध करने के लिए दिया गया है कि तलाक प्रथा हिंदू समाज में पहले भी मौजूद थी। मैं सम्मानपूर्वक कहना चाहता हूँ कि राउ समिति के असंतुष्ट सदस्य, श्री द्वारका नाथ मित्तर द्वारा यह उद्घृत किया गया था कि उन्होंने समिति के समक्ष इन उक्त पवित्र ग्रंथों को प्रस्तुत किया था। पर उन्होंने उनकी व्याख्या मात्र अपने संस्कृत के ज्ञान के आधार पर ही नहीं, अपितु विद्वान पंडितों के ज्ञान के आधार पर भी की थी। उन्होंने बताया था कि नारद तथा पराशर की अमित व्याख्या तथा विश्लेषण केवल यह है कि विवाह की प्रक्रिया से पूर्व, सगाई होने तक ही सम्बन्ध-विछेद मुमकिन है, वह विवाह संपन्न होने के बाद संभव नहीं है। प्रथा को प्रमाणित करने के लिए स्मृतियों को आधार नहीं बनाना चाहिए।
माननीय कानून मंत्री द्वारा प्रस्तुत और पंडित ठाकुर दास भार्गव द्वारा दोहराए गए वक्तव्य में बताया गया था कि हिंदू समाज में 90 प्रतिशत तलाक के मामले पहले से मौजूद हैं। और पंडित ठाकुर दास भार्गव के अनुसार तो हिंदूसमाज में तलाक के मात्र 90 प्रतिशत नहीं, अपितु 95 प्रतिशत मामले मौजूद हैं। मैं सम्मानपूर्वक पूछना चाहता हूँ कि यदि आपने तो कहा वह तथ्य है, तो तलाक से संबंधी कानून को लागू करने की आवश्यकता क्या है? आप बहुसंख्यक के लिए कानून बनाने की सोच रहे हैं, न कि निराश अल्पसंख्यक के लिए। जिस तलाक के प्रावधान को आप इस अधिनियम में लाना चाहते हो, उससे हिंदू समाज के उन 90 प्रतिशत या 95 प्रतिशत लोगों का जीवन और दुखदायी हो जाएगा, जिनके मध्य तलाक के मामले पहले से, जैसा आपने कहा मौजूद हैं, क्योंकि मौजूदा विधेयक के प्रावधानों के अनुसार विवाह से संबंधित पक्षों की जिम्मेदारी होगी कि वे तलाक लेने से पूर्व विवाह भंग किए जाने की प्रक्रिया हेतु न्यायालय के समक्ष जाएँ। एक सदस्य ने प्रवर समिति को लिखे अपने असहमति की टिप्पणी में अद्भुत किया है कि देश के अधिकतर भागों में कृषकों के बीच तलाक किसी करार या अन्य तरीके से ग्राम की पंचायत के समक्ष अत्यंत सरल तरीके से लिया जा सकता है। अतः