भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 597

582 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आपको इस कानून के प्रभाव पर अवश्य विचार करना चाहिए। क्योंकि यह जनसंख्या के 90 प्रतिशत लोगों को जो कृषक हैं, प्रभावित करेगा। आखिर क्या प्रभाव होगा, यदि धारा 34 को सांविधिक पुस्तक में शामिल कर लिया जाए? तब प्रत्येक दम्पत्ति, विवाह से संबंधित प्रत्येक सदस्य, प्रत्येक पार्टी, न्यायालय में जाने के लिए मजबूर हो जाएंगे और अपील करते रहेंगे जब तक उनका तलाक प्रभावी नहीं हो जाता।

मेरा निवेदन है कि इससे लाभ नहीं होगा, अपितु बहुसंख्यकों के लिए, जहाँ तलाक की प्रथा प्रचलन में है यह काफी अलाभकारी होगा। इसलिए, इस तरह के प्रावधानों को अधिनियमित करने से ने केवल 5 प्रतिशत निराश अल्पसंख्यक लोग प्रभावित होंगे, अपितु यह बहुसंख्यक 90 प्रतिशत के लिए भी अलाभकारी होगा। इसलिए, जब तक इन प्रावधानों में आमूलचूल परिवर्तन व संशोधन नहीं किया जाता, तब तक इसे सांविधानिक पुस्तक में न शामिल किया जाए। अब मैं दत्तकग्रहण के मसले पर आता हूँ। इस विधेयक के विद्वान और मसौदाकारों ने हिंदू कानून में रेखांकित दत्तकग्रहण की मूलभूत अवधारणा को ही अनदेखा कर दिया है। जहाँ तक मेरी छोटी-सी जानकारी है, उसके अनुसार दत्तकग्रहण किसी कानून द्वारा मान्यताप्राप्त नहीं है। मुस्लिम कानून में रीति-रिवाजों द्वारा ऐसा प्रचलन में था, पर अब इसे कानून द्वारा निरस्त किया जा रहा है। हिंदू अवधारणा के अनुसार भी किसी हिंदू का जीवन उसकी धार्मिक परंपरा और धर्म की सोच के साथ इतना घुला-मिला है कि उन दोनों को अलग करना नामुमकिन है।

श्री एच.वी. कॉमथ ः क्या माननीय कानून मंत्री इस समय किसी विश्राम या ध्यानावस्था में हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं माननीय सदस्य को सुन रहा हूँ।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः हिंदू कानून में मेरा निवेदन था कि दत्तकग्रहण धार्मिक विश्वासों पर निर्भर है, जिसके अनुसार किसी दिवंगत व्यक्ति की आत्मा की मुक्ति के लिए यह आवश्यक है कि उसका कोई पुत्र हो जो उसके लिए पूजा अर्चना करे। ताकि उसे मोक्ष प्राप्त हो सके। इसलिए यदि आप दत्तकग्रहण से संबंधित कानून बनाने जा रहे हैं, तो आपको इस अवधारणा को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। यदि आप इसे जारी रखते हैं तो आप दत्तक ग्रहण के सिद्धांत में निहित आत्मा को सम्मान देते है। (एक सम्मानीय सदस्यः ‘आत्मा क्या है? (यानी दत्तकग्रहण की वैधता के लिए इस विधेयक में आपने कौन से मापदंड निर्धारित किए हैं? जबकि हिंदू कानून कहता है कि वरिष्ठतम एवं इकलौते पुत्र को गोद नहीं लिया जा सकता। इस प्रमुख विशेषता के बावजूद यदि आप इसके बरअम्स यह चाहते हैं कि वरिष्ठतम एवं इकलौते पुत्र भी गोद लिया जा सकता है। (एक माननीय सदस्यः ‘यह अनुचित है।’)