भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 598

583

बाबू रामनारायण सिंहः ऐसा अज्ञानता के कारण होता है।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः यह दत्तकग्रहण की मूल अवधारणा पर प्रहार है, क्योंकि हिंदू कानून के अनुसार वरिष्ठतम या इकलौता पुत्र ही अपने दिवंगत पिता का अंतिम संस्कार संपन्न करता है। इसी प्रकार, इस विधेयक में जिस लड़के को दत्तक पुत्र बनाना है उसके लिए कौन-सी पात्रताएं निर्धारित की गई हैं? उसमें तीन शर्तें निर्धारित की गई हैं। यानी उसकी उम्र 15 वर्षों से कम होनी चाहिए, वह विवाहित नहीं होना चाहिए, और वह हिंदू अवश्य होना चाहिए। मैं सम्मानपूर्वक यह कहना चाहता हूँ कि इस प्रकार के प्रावधान द्वारा आप हिंदुओं को बड़ी दुविधा में डाल रहे हैं क्योंकि दत्तकग्रहण से संबंधित हिंदू समाज की सुविदित अवधारणा और रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह कोई अपात्रता नहीं है न ही उम्र कोई बाधा या अपात्रता है। मैं आपसे पूछता हूँ कि क्यों आप इस तरह शर्तें आरोपित कर रहे हैं? क्या अतीत में कानून के प्रयोग से संबंधित आपके अनुभवों से लगता है कि ये प्रतिबंध आवश्यक हैं? मेरी कानून संबंधी तुच्छ जानकारी कहती है कि ऐसा कोई मामला नहीं है, जहाँ कोई कठिनाई उत्पन्न हुई हो। वहाँ पारंपरिक कानून द्वारा विवाहित लड़के को भी गोद लेने की वैधता को मान्यता दी गई है। इसी तरह, बेशक उसकी उम्र कुछ भी हो, गोद लेना वैध है। तब किन कठिनाइयों के अनुभवों के कारण मौजूदा कानून में परिवर्तन करना आवश्यक समझा गया है? इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता कि जब आप कोई परिवर्तन करने का प्रयास करते हो, तो आपके पास अवश्य कोई अकाट्य कारण होने चाहिए, अन्यथा आपको मौजूदा कानून को आवश्यक मान्यता देनी होगी। इसके बाद दत्तकग्रहण के प्रभाव के बारे में। आपने हिंदू कानून की प्रत्येक सुस्थापित परंपरा को अलविदा कह दिया है। राउ विधेयक ने प्रस्तावित किया था कि दत्तकग्रहण के प्रभाव के अंतर्गत गोद लेने के तीन वर्षों के भीतर अर्जित संपत्ति के स्वामित्व को स्वीकार करना होगा। मौजूद विधेयक इसके आगे जाता है और कहता है कि जैसे ही दत्तकग्रहण प्रक्रिया पूरी होती है तो संपत्ति को संवितरित करने का कोई प्रश्न नहीं उठेगा। अब तारीख से आधा हिस्सा विधवा या पुरुष को जाएगा और बाकी आधा दत्तक पुत्र को जाएगा। मेरा सविनय अनुरोध है कि क्यों आप इस दत्तकग्रहण में नया सिद्धांत लाने के इच्छुक हैं? इसके पीछे कौन-सा कारण है? क्या अतीत में कोई समस्या उत्पन्न हुई है।

अब संयुक्त हिंदू परिवार में व्यवधान का प्रश्न आता है। मुझे ऐसा लगता है कि एक बहुत ही महत्वपूर्ण और मूलभूत परिवर्तन किए जाने की कोशिश की जा रही है। क्यों संयुक्त हिंदु परिवार की इस कालिक प्राचीन सम्मानित व्यवस्था आपको अब खटकने लगी है? यह कहा गया है कि संयुक्त हिंदू परिवार जिस मूल रूप से स्थापित हुए थे, उनकी विशेषताओं का विभिन्न कानूनों द्वारा हनन हुआ है।