46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जब यह समिति साक्ष्यों का अभिलेख करने के लिए लाहौर में थी, तब उस प्रतिवेदन में यह कहा गया थाःµ
फ्वास्तव में यह तथ्य है कि पंजाब में जहां मैं इस समिति की अध्यक्षता कर रहा था, लगभग 500 महिलाओं ने लाहौर स्थित कामर्शियल म्यूजियम हॉल में प्रवेश किया, जहां बैठक की कार्यवाही चल रही थी और उन्होंने करबद्ध यह कहाµ‘आप दामाद को परिवार में न लायें और परिवार के अन्दर पारिवारिक धंधों को बर्बाद न करें।य्
यदि आप पारिवारिक धंधों के संबंध में कृपापूर्वक विचार करते हैं कि लोगों के पारिवारिक धंधों पर इसका क्या प्रभाव होगा, तो आपको सीधे-सीधे बदनाम कर दिया जाएगा। मान लीजिए पिता और उसके पुत्रों द्वारा संचालित कोई अच्छा व्यापार चल रहा है और पिता का देहान्त होता है और व्यापार परिवार के शेष सदस्यों द्वारा संयुक्त प्रयास से चलाया जा रहा है। दामाद तब व्यापार में प्रवेश करता है। ऐसी स्थिति में व्यापार में क्या होगा? वह बर्बाद हो जाएगा। मैं सदन का ध्यान उस प्रतिवेदन के पृष्ठ 139 की ओर आकर्षित करता हूँ। यह कहना गलत है कि सभी महिलाएं इसके पक्ष में हैं। हजारों प्रबुद्ध महिलाओं ने इसका समर्थन नहीं किया था, इसका कारण यह नहीं है कि वे पुत्री को अधिकार नहीं देना चाहतीं। मैं इस बात को दोहराना चाहता हूँ कि जहां तक मेरा संबंध है, साथ ही उन लोगों का संबंध है, जो मेरे समान ही विचार करते हैं, हम यह नहीं देखना चाहते कि पुत्री को पूरा अधिकार नहीं दिया जाए अथवा महिलाओं को उसका पूरा अधिकार नहीं दिया गया है। हम चाहते हैं कि महिलाओं को पुरुष के बराबर आना चाहिए तथा उन्हें समान अधिकार मिलने चाहिए। मैं डॉ. अम्बेडकर के साथ हूँ। मैं उनके समान ही प्रगतिशील परंपरावादी हूँ। मैं इस अभिव्यक्ति को अत्यधिक पसंद करता हूँ। मैं प्रगतिशील विचार से संबंधित नहीं हूँ। डॉ. अम्बेडकर ने बताया है कि यह विधेयक न तो क्रांतिकारी है और न ही सुधारवादी है। यह विधेयक कुछ मामलों के विषय में है परन्तु इस विधेयक में कुछ सुधार जरूरी हैं। आज हिंदू समाज में कुछ आत्मविश्लेषण किया गया है और यह देखने में आया है कि हिंदू समाज का क्षरण हुआ है। यह हमारा कर्तव्य है कि हम यह देखें कि डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में इस कुछ का सधारण किया जाना है इसलिए मैं यह निवेदन करता हूँ कि इस विचार से किसी व्यक्ति को दूर नहीं भागना चाहिए। इस रिक्त सोच से कि हम अपनी बहनों और पुत्रियों के साथ न्याय करना नहीं चाहते। यदि हमारी बहन और पुत्रियां इस प्रकार का विचार रखती हैं, तो यह उनकी बड़ी भूल है। श्रीमान, मैं आपकी सद्भावना जानता हूँ। आप महाशय भी इस विचार के पक्ष में हैं कि उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। इसलिए मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि उसे इस विचार की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि इस विधेयक का व्यापक प्रचार-प्रसार हो और यह प्रचार-प्रसार आगामी चुनाव के बाद हो सकता है जब हमारे सदन में अधिक जन-प्रतिनिधित्व हो। मैं यह नहीं कहता कि यह