भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 600

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मेरा सादर कहना यह है कि राउ समिति ने जो भी व्यवस्था की, यह उसके भी विरुद्ध है। और जनता की राय, जो जांच के लिए ली गई थी, उस विधेयक पर लागू नहीं है जो आज यहाँ विद्यमान है, बल्कि उस विधेयक पर लागू है, जो राउ समिति द्वारा तैयार किया गया था। अतः ऐसी कोई जानकारी यहाँ पूर्णतः अनुपलब्ध है कि ऐसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों का मुद्दा इस विधेयक के ढांचे में क्यों शामिल किया गया है।

अस्तु, एक संयुक्त हिंदू परिवार के क्या लाभ हैं? सहसमांशिता वाली सम्पत्ति के क्या लाभ हैं? मैं कहता हूँ कि...

श्री बी. एन. मुनावल्ली (बम्बई प्रांत)ः क्या हानियां कोई नहीं हैं?

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः बेशक, हानियां भी हैं, यदि हर व्यक्ति पूरी तरह से अपने लिए स्वार्थी हो जाए, और अपने संबंधियों के प्रति कुछ भी आदर नहीं करते। किन्तु यदि आप समाज को उस नशरिये से देखें, जिससे स्मृतियां हमें देखना चाहती हैं, तो हमें दूसरों के लिए भी, अन्य सदस्यों के लिए भी, त्याग करना चाहिए। परिवार के एक संयुक्त परिवार बनाने के लिए कुछ कुर्बानी करनी चाहिए, इससे कोई हानि नहीं होगी। इसमें लाभ ही लाभ है हानि नहीं। पर मेरा कहना है कि प्रत्येक हिंदू परिवार द्वारा संभवतः इसे अपनाया नहीं जा सकता।

मेरे एक मित्र ने यहां मुझे स्मरण कराया है कि बंगाल और असम में मिताक्षर का रिवाज नहीं है। किंतु, महोदय, आप पूरे देश को सामने रखें और....

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः संयुक्त परिवार भी मौजूद है।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः 30 करोड़ जनसंख्या का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं-ऐसी जनसंख्या जो कश्मीर से कन्या कुमारी और गुजरात से देश के दूरस्थ स्थान तक बसती हैं और आप उस संयुक्त परिवार की व्यवस्था को भंग करना चाहते हैं, जिसके व्यापक रूप से इतनी बड़ी जनसंख्या प्रभावित होगी। क्या इस विधि व्यवस्था से आप परिवार को भी भंग करना चाहते हैं? यदि यह व्यवस्था जर्जर हो जाती है, यदि यह जीर्ण-शीर्ण हो जाती है, यदि यह, जैसा एक सदस्य ने कहा है, एक ऐसी स्थिति में आ जाती है कि हमें इसके लिए आंसू बहाने की कोई आवश्यकता नहीं है, तो इसे एक प्राकृतिक मौत करने दें। आप विघटन की कुल्हाड़ी स्वयं क्यों चलाते हैं और इसे मारना चाहते है?

महोदय, अब मैं उत्तराधिकार के प्रश्न पर आता हूँ। इस पर यहाँ मुझे एक बहुत बड़ी शिकायत मिली है। जैसा मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद ने कहा है कि राउ समिति के विधेयक के स्थान पर एक विभागीय समिति का विधेयक लाया गया था और इस विभागीय विधेयक में नए विचार रखे गए थे। धारा 94 में यह व्यवस्था है कि इस