586 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विधेयक में उल्लिखित उत्तराधिकार के नियमों को शामिल नहीं किया जाएगा। मूल राउ समिति विधेयक में यह व्यवस्था थी कि कृषि सम्पत्ति का प्रत्येक टुकड़ा, यहाँ निर्धारित उत्तराधिकार के नियमों द्वारा शासित नहीं होगा, क्योंकि भारत सरकार के अधिनियम के अंतर्गत यह केन्द्र सरकार के कार्यक्षेत्र और न्यायाधिकार में नहीं आता। राउ विधेयक में यह नहीं कहा गया है कि केन्द्रीकरण राउ विधेयक में यह नहीं कहा गया है कि केन्द्रीयकृत रूप से शासित क्षेत्रों के मामलों में जो सीधे भारत सरकार के नियंत्रण और पर्यवेक्षण में हैं, कोई छूट नहीं है।
श्रीमान्, विभागगीय विधेयक में ‘गवर्नर के प्रांतों में’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए थे, फलस्वरूप मेरे प्रांत अजमेर-मेड़वाड़ के साथ-साथ दिल्ली और कुर्ग, जो केन्द्रीय प्रशासन के कार्यक्षेत्र है, के प्रांतों में भी प्रत्येक कृषि सम्पत्ति यहां उल्लिखित उत्तराधिकार के नियमों द्वारा शासित होगी। इस विसंगति को देखें, जो इस कानून के द्वारा तय कर दी गई थी। वह कानून जो भारी मात्रा में सम्पत्ति को शासित करेगा, वह गर्वनर वाले प्रांतों में बिल्कुल भिन्न होगा, जबकि केन्द्र द्वारा शासित क्षेत्रों में एकदम विपरीत होगा। क्या यह वही समानता है, जिसे एक छोटे से अलग कानून के द्वारा लाने का उद्देश्य है? क्या यह समानता के आदर्श से सामंजस्य बिठाना होगा अथवा यह इसके विरुद्ध होगा। क्या मैं इस बारे में सादर पूछ सकता हूँ? मेरा कहना है कि उत्तराधिकार के वे सभी नियम जो आपने विधेयक के प्रावधानों में उल्लिखित किए हैं, यदि उन्हें मेरे प्रान्त में कृषि सम्पत्ति के लिए लागू किया जाता है-और क्या मैं अपने प्रान्त और अपने प्रान्त में रहने वाले लोगों की कुछ जानकारी के आधार पर बोल सकता हूँ-मैं कहता हूँ कि कानून में उल्लिखित निर्देश न मानते हुए उसका उल्लंघन किया जाएगा, क्योंकि आपने उत्तराधिकार के जो नियम निर्धारित किए हैं, वे लोगों के प्रचलित उपायों और रिवाजों से इतने भिन्न हैं कि वे उन्हें शासन के नियम के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे, भले ही उनका जीवन जोखिम में पड़ जाए। आपने भाग VIII, अध्याय 2 और अनुसूची VII में उत्तराधिकार के जो नियम शामिल किए हैं, वे क्या हैं? क्या वे हिंदू कानून के स्वीकार्य सिद्धांतों में प्रस्तुत किया गया है और इनका संकेत भी कहा किया गया है? विरासत के लिए आपने क्या आधार लिए हैं? आप कहते हैं, यह ‘नैसर्गिक प्रेम और स्नेह है’। विरासत के मामले में जहाँ तक सादृश्यता और सगोत्रता का संबंध है, हिन्दू कानून के मौलिक सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है। हिन्दू कानून में उत्तराधिकार का एक मौलिक सिद्धांत यह है कि यह उत्तरवर्तियों की क्षमता और देयता पर आधारित है कि वे अपने माता-पिता के लिए कैसी श्रद्धा रखते हैं। यह मौलिक क्षमता है जिसे विरासत के कानून में शामिल किया जाना चिहए। निसंदेह, दृष्टिकोण यह है कि हम हिन्दू कानून का ध्यान नहीं रख रहे हैं। यह वहां से ‘हिन्दू’ शब्द को हटाने की तुलना में एक अलग मामला है,