588 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है कि जो भी हिस्सा दिया जाता है, वह अविवाहित पुत्री को दिया जाता है और हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं होती, और आज भी एक अविवाहित पुत्री को उसका हिस्सा दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं की जाती है। तब आज यह प्रश्न उठता है कि वास्तविक स्थिति क्या है? क्या कोई इसे नकार सकता है कि आज हमारों में से एक भी पुत्री अविवाहित नहीं रहती। परिवार की हैसियत के अनुसार पुत्री को पुत्रों के समान ही शिक्षा और सम्मान दिया जाता है। जब उसका विवाह होता है, तो परिवार की रिति के अनुसार उसे दहेज दिया जाता है, पर विवाह के बाद भी भाई के साथ उसका रिश्ता नहीं टूटता। जहाँ तक मेरा अनुभव है, परिवार के हर समारोह में उसे आमंत्रित किया जाता है और उसके माता-पिता के घर में विवाह आदि अवसरों पर रिवाज के अनुसार उसे नियम राशि आदि भी दी जाती है। क्या कोई यह कह सकता है कि अदालती कानून का सहारा घर में खुशियां और निष्कपटता लेकर आएगा? ऐसा कोई भी कदम स्थिति को बिगाड़ ही देगा और विधेयक के प्रावधानों के लिए अदालत का सहारा लेना हमारे लिए बहुत शर्म की बात होगी। हम नहीं चाहते कि हमारी पुत्रियां और बहनें अदालत में जाएं। हमारे मनीषियों ने भी कभी ऐसा कार्य नहीं किया कि उन्हें अदालतों का सहारा लेना पड़ा हो। परिवार में हमारी पुत्रियों की स्थिति के अनुसार एक ऐसा अलग-सा सद्व्यवहार है, जिसे कहीं और देख पाना बहुत कठिन है। जैसा कि मैंने कहा था, विवाह के बाद भी, त्योहार आदि के अवसरों के लिए पुत्री को देने के लिए पारिवारिक बजट में एक निश्चित हिस्सा रहता है। यह प्रश्न उठा था, कि क्या अपने अधिकारों को मनवाने के लिए वह अदालत में जा सकती है? महोदय, यदि किसी परिवार में एक लड़की का पिता अथवा भाई, उसके प्रति अपने कर्तव्यों को निर्वाह नहीं करते, तो उन्हें समाज द्वारा गिरी हुई निगाहों से देखा जाता है। निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार परिवार में भाई के विवाह के समय प्रत्येक पुत्री को मौजूद रहना चाहिए। मैं माननीय सदस्यों से कहना चाहता हूँ कि एक तय समारोह के अनुसार दूल्हा और दुल्हन के घर में प्रवेश से पहले बहन और उसके पति को एक विशेष रस्म अदा करनी पड़ती है। यह प्राचीन समय से चले आ रहे रिवाश हैं। हम पुत्रियों को एक सुनिश्चित स्थान देते हैं। तब परिवार की सम्पत्ति में से उसे एक हिस्सा देकर आपको क्या लाभ होगा? इस सुधार का एक औचित्य यह है कि एक पुत्र और पुत्री के बीच बराबर समानता होनी चाहिए। क्या मैं जान सकता हूँ कि इस तथ्य में कोई समानता है? क्या यह दिखावटी समानता नहीं है, जो आप अपनी पुत्री को सौंपने जा रहे हैं? परिस्थितियाँ एकदम अलग हैं। हमारी पुत्री को एक भिन्न परिवार में जाना होता है, जब कि पुत्र को नहीं जाना होता। ये शर्तें हमारे परिवेश में निहित होती हैं। अतः, आप जो भी कानून बनाएँ, वे परिवेश के अनुकूल होने चाहिए