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मत का एक मुद्दा बनाने की घोषण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रश्न पर ठण्डे दिमाग से कार्रवाई करने की आवश्यकता है और हमें इसके दूरगामी परिणामों पर विचार करने की आवश्यकता है कि क्या यह उपाय हिन्दू समाज के पूरे ढांचे और उसके निर्माण पर विध्वंसक प्रभाव तो नहीं डालेगा?
अब मैं अपने भाषण के पहले चरण, जहाँ से मैंने छोड़ा था, पर आता हूँ। मैं उस अभिनव कानून पर बात कर रहा था, जो इस कानून के एक भाग के रूप में लाया गया है, अर्थात् पुत्री को पुत्र के समान मानते हुए उत्तराधिकार में समान स्थान दिया गया है। मेरा सादर निवेदन यह था और है, कि इस अभिनव कानून को पूरी तरह समाप्त किया जाए और यह भी कि यह अभिनव कानून हिंदू समाज के संपूर्ण ढांचे को ढहा देगा। मैं बताता हूँ यह कैसे संभव है। हिन्दू समाज की वास्तविक दशा क्या है? पुरुष और महिला के बीच भेद, पुत्र और पुत्री के बीच भेद, इसी परिस्थति में यह अंतर्निहित है। पुत्र अपने पूरे जीवनकाल में, अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक, उसी परिवार के साथ रहता है जहाँ उनका जन्म हुआ है। पुत्री को एक अनजान परिवार में जाना पड़ता है। इस अन्तर्निहित परिस्थिति के फलस्वरूप क्या परिणाम सामने आते हैं? हिन्दू कानून के निर्माताओं, वे व्यक्ति जिन्होंने हमें वेद दिए, क्या वे इतने निचली सोच वाले थे, क्या वे लिंग अनुपात के इतने विरुद्ध थे कि उन्होंने केवल असमानता अथवा अन्याय के दृष्टिकोण यह सब किया? मैं सादर कहता हूँ कि यह सम्पूर्ण वेदों और हिन्दू कानून का एक गलत पाठ है। वस्तुतः यदि पैतृक सम्पत्ति के उत्तराधिकार का अधिकार पुत्री को दिया जाता है, तो उसके परिणाम सोचकर ही मैं सिहर जाता हूँ। माननीय कानून मंत्री, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा था, कि एक हिन्दू व्यक्ति के बारह पुत्र और एक पुत्री है तथा उसकी मृत्यु होने पर उसकी सम्पत्ति को बारह हिस्सों में बांटा जाता है, ऐसी स्थिति में यदि सम्पत्ति को बारह की बजाय तेरह हिस्सों में बांटा जाए तो क्या आसमान गिर पड़ेगा? मैं माननीय कानून मंत्री से सादर पूछना चाहता हूँ कि वे इसकी विपरीत स्थिति मानकर देखें, जहाँ एक व्यक्ति के बारह पुत्रियां हों और एक पुत्र हो। उस स्थिति में क्या होगा?
माननीय श्री जगजीवन राम (श्रम मंत्री)ः अब तेरह हिस्से होंगे।
पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः क्या एक परिवार के मकान में तेरह हिस्से किए जा सकते हैं? ग्रामीण भारत को देखें, शहरी भारत की बात नहीं सोचें, जहां लोग महलों में रहते हैं, बल्कि ग्रामीण भारत की सोचें जहां एक परिवार बहुत छोटे से घर में रहता है। यदि पिता की मृत्यु के बाद, उसके मकान को तेरह हिस्सों में बांट दिया जाए और तेरह दामादों को उस मकान में समायोजित करना हो, तो क्या होगा? और महोदय, जैसा कि इस कानून में प्रस्ताव है कि पुत्री पर छोड़ दिया जाए कि वह जिससे चाहे उससे विवाह कर ले, तब बे-रोकटोक होने पर यदि वह एक गौर-हिन्दू से विवाह कर