भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 609

594 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लेती है, और उत्तराधिकार के लिए भी अपात्र न हो, तो परिणाम क्या होगा? परिणाम यह होगा कि प्रत्येक घर, और प्रत्येक परिवार पुश्तैनी दुश्मनी वाला परिवार बन जाएगा, जिसमें झगड़े होंगे और इससे भी बुरी स्थिति-हत्याएं तक होंगी। अतः, महोदय, मैं सादर अनुरोध करता हूँ कि जब आप एक कानून का निर्माण कर रहे हैं तो आप केवल एक व्यक्ति का ही उदाहरण न लें, जिस पर माननीय कानून मंत्री ने सदन का ध्यानाकर्षित किया है, बल्कि आपको प्रत्येक काल्पनिक मामले पर भी विचार करना होगा, और आपको उसी आधार पर कानून बनाना होगा।

लेकिन हिन्दू समाज में पुत्री की स्थिति को लेकर यह घटिया मनोवृत्ति आई क्यों है? मैं यहाँ इसके निहितार्थ का ही विरोध करता हूँ क्योंकि वास्तविकता यह है कि हिन्दू समाज में पुत्री को बहुत उन्नत और ऊँचा स्थान प्राप्त है। एक अनजान परिवार में उसके विवाह के बाद भी अपने पिता के नैसर्गिक परिवार से उसके संबंध समाप्त नहीं होते। प्रत्येक अवसर पर, चाहे वह किसी का जन्म हो, मृत्यु हो, विवाह अथवा अन्य कोई अवसर हो, उसे अपने पिता के घर आकर कुछ अनिवार्य रीतियाँ निभानी पड़ती हैं, और उन अवसरों पर हिन्दू परिवार में पुत्री को तोहफे भी दिए जाते हैं। इस तरह पुत्री के अनेक नैसर्गिक परिवार से संबंध लगातार जारी रहते हैं। यदि वह एक बच्चे को जन्म देती हैं, तो उसके भाई उसे तोहफे देते हैं। श्रीमान्, मैं जोर देकर यह कहना चाहता हूँ कि बहन के परिवार में होने वाले प्रत्येक विवाह-समारोह में, उसके भाइयों को तोहफे देने पड़ते हैं, चाहे वह विवाह लड़के का हो अथवा लड़की का, भाई तोहफे देते हैं। प्रत्येक अवसर पर तोहफे देना अनिवार्यता है। तो इतना होने पर श्रीमान्, मैं कैसे कह सकता हूँ कि पुत्री को सम्पत्ति से कुछ प्राप्त नहीं होता? मेरा कहना है कि यह प्रश्न जो उठाया गया है, यदि आप हिन्दू सभ्यता और हिन्दू विचारधारा के दृष्टिकोण से देखें तो उसके पीछे पूरी मानसिकता ही गलत है। निसंदेह यदि आपका निष्कर्ष स्वेदशी नहीं है, यदि वह हिन्दू विचारधारा का नहीं है, या भारतीय नहीं है, बल्कि भारत-विरोधी और हिन्दू विचारधारा-विरोधी है, तो बेशक आप विरोधी दृष्टिकोण रखेंगे।

आइए, अब हम विचार करें कि परिवार की पैतृक सम्पत्ति में पुत्री को एक हिस्सा देने का क्या परिणाम होता है। आप मुस्लिम परिवार का उदाहरण देखें। पैतृक सम्पत्ति में उसका हिस्सा दिए जाने का अपरिहार्य परिणाम यह होगा कि चचेरे भाई-बहनों में विवाह बिल्कुल आम हो जाएगा, और देर-सवेर प्रतिबंधित सीता तक विवाह प्रचलित हो जाएंगे, भले ही आप उसे पसंद करें अथवा नहीं। यह इसके परिणाम भी अवश्यभावी होंगे। यदि आप पैतृक सम्पत्ति में पुत्री के हिस्से का इतिहास देखें तो कई देशों में जैसे मिस्र, यूनान, रोम अथवा इस्लामिक कानून के अंतर्गत, आप इस निष्कर्ष पर पहुंचेगे, और वह अंतिम निष्कर्ष होगा, कि यदि एक हिस्सा दिया जाना हो, तो पहले चचेरे भाई-बहन से विवाह करने के कानूनी अधिकार के दायरे को निश्चित रूप से बढ़ाना होगा। इस बारे