भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 610

595

में जहाँ तक हिन्दूवादी दृष्टिकोण का संबंध है, यह एक आपदा की भांति होगा, जिसे कोई हिन्दू परिवार बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।

अब मैं अगले मुद्दे पर आता हूँ। क्या आप सोचते हैं कि इस छोटे से कानून में यह व्यवस्था करके कि पुत्री का सम्पत्ति में हिस्सा पुत्र के बराबर है, आप वह करने जा रहे हैं, जो आप चाहते हैं, जिसे कहा जाए तो, आप पुत्री को सम्पत्ति का अधिकार प्रदान करेंगे? मैं सादर कहता हूँ कि ऐसा नहीं है। दूसरी ओर आप अनेक कुरीतियों का मार्ग प्रशस्त करेंगे और उनका दायरा भी बढ़ा देंगे। इस कानून के अंतर्गत जैसा कि हिन्दू संहिता में इसे शामिल किया गया है, किसी भी पिता के लिए यह विकल्प उपलब्ध होगा कि वह सम्पत्ति अपने किसी भी पुत्र को मौखिक तौर पर पुरस्कार स्वरूप दे दे, अथवा एक वसीयत द्वारा समस्त सम्पत्ति का निपटारा कर दे। क्या इस पर कोई रोक है? मैं पूछता हूँ, यदि कोई रोक नहीं है, तो जब तक समाज पुत्री को बराबर का हिस्सा देने को तैयार नहीं हो जाता, तब तक इस कानून का परिणाम केवल पैतृक सम्पत्ति की व्यवस्था अथवा पिता द्वारा अपने पुत्रों को समस्त संपत्ति मौखिक रूप से पुरस्कार स्वरूप दे देने की व्यवस्था करना होगा। एक वकील होने के नाते मुझे अदालतों का भी अनुभव है_ यहाँ कुछ अन्य मित्र भी हैं जिन्हें अदालतों का पूर्ण अनुभव है। क्या यह एक तथ्य नहीं है कि वसीयत और इच्छा-पत्र के प्रत्येक दस मामलों में से नौ मामले अदालत में जाते हैं और बहुत लम्बी कानूनी प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं? निपटान क्षमता के संबंध में न केवल प्रश्न, अपितु प्रश्न वसीयत करने वाले, जो अपनी वसीयत और इच्छा को लागू करने के लिए स्वतंत्र है, के संबंध में उठता है वसीयत जैसे एक जटिल दस्तावेज की विभिन्न धाराओं की व्याख्या में इसे तैयार करने संबंधी जटिल प्रश्न पैदा होते हैं। वह भी एक न्यायालय में नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय अर्थात् प्रिवी काउंसलि में भी पैदा होते हैं। यदि यह स्थिति है, तो क्या मैं कुछ पूछ सकता हूँ कि आप पुत्री के हितों की रक्षा में कैसे सफल होंगे? मेरा सादर कथन है कि आप यह छोटा-सा विघटनकारी कानून बनाकर पुत्री के हितों की रक्षा नहीं करेंगे, परन्तु आप उसे एक निश्चित हानि पहुंचा रहे हैं, जिसे वापस ला पाना आपके लिए कठिन ही होगा। एक हिंदू परिवार का नितांत मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी बदल जाएगां जैसे ही कानून में यह व्यवस्था की जाती है कि पैतृक सम्पत्ति में पुत्री का हिस्सा भी होगा, भाई अपनी बहन की देखभाल और विवाह आदि के व्यय के कर्तव्य से स्वयं को एकदम मुक्त महसूस करेगा। आज हिंदू परिवारों की क्या स्थिति है? कितने प्रतिशत परिवारों के पास अचल संपत्ति है? मेरा कहना है कि यह संख्या चालीस प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। शेष साठ प्रतिशत परिवारों का क्या होगा? मैं सोचकर सिहर जाता हूँ। उन साठ प्रतिशत परिवारों का क्या होगा जो मिताक्षर कानून द्वारा शासित हैं, जिनके पास बिल्कुल भी सम्पत्ति नहीं है? क्योंकि कानून द्वारा बहन को भाई के बराबर दर्जा दिया जाता है, तो भाई जो अभी तक अपनी बहन को उसका विवाह होने तक उसके पालन-पोषण को एक बोझ या उत्तरदायित्व