भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 611

596 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

समझता है और उसका विवाह करता है, उसे देहज देता है, उसे सब-कुछ प्रदान करना चाहता है, वह कर्तव्यनिष्ठ भाई इस स्थिति में स्वयं को जिम्मेदारियों से मुक्त समझ लेगा। परिणाम यह होगा, यानी इस अनर्थकारी प्रावधान का परिणाम, कि पुत्री को कोई संबंधित लाभ नहीं मिल पाएगा। अतः, मेरा सादर निवेदन का यह आधार नहीं है कि पुत्री, पुत्र के समान नहीं है, न ही मेरा कथन लिंगानुपात के विरुद्ध किसी पूर्वाग्राह के कारण है, बल्कि स्वयं पुत्री के हितों को लेकर है, कि यह प्रावधान नहीं किया जाना चाहिए। निस्संदेह पुत्री के पास अपने हितों की रक्षा के लिए अन्य माध्यम है। वे अपने पति की सम्पत्ति में, अपने ससुर की सम्पत्ति में बहुमूल्य अधिकार पा सकती हैं।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारती (मद्रासः सामान्य)ः हम वे पहले ही दे चुके हैं।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः यदि वे पहले दिए जा चुके हैं तो पैतृक सम्पत्ति में उसे हिस्सा देना बिल्कुल जरूरी नहीं है। जहाँ तक मैं भी कानून को समझता हूँ, उसमें जो सीमित प्रकृति का अधिकार दिया गया है_ आप निश्चिय तौर पर उसे व्यापक बना सकते हैं, और पुत्री को उसके ससुर की सम्पत्ति में उसके पति के समान एक अधिकार दे सकते हैं। यह एक बहुत अच्छा सुझाव है जिस पर हम विचार कर सकते हैं।

महोदय, अब मैं इस क्रांतिकारी कानून के अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तनों पर आता हूँ। मेरा अभिप्राय संयुक्त परिवार के विघटन से है। इस विधेयक की धारा 86 के अंतर्गत एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कोई भी कानूनी अदालत यहाँ से आगे जन्म के अधिकार को संज्ञेय मानने की पात्र नहीं होगी। मैं इस प्रावधान से उत्पन्न होने वाले बुरे परिणामों को सोचकर सिहर उठता हूँ। यह बताया गया है कि बंगाल और असम, कानून की दयाभाग व्यवस्था द्वारा पहले से ही शासित हैं, जिसमें संयुक्त परिवार को मान्यता नहीं दी जाती। इस व्यवस्था में परिवार का प्रत्येक सदस्य समान अधिकार रखता है। क्या इसका अभिप्राय यह है कि यह व्यवस्था पूरे भारत में लागू की जानी चाहिए? यदि पांच करोड़ आबादी इस व्यवस्था द्वारा शासित होती है, और पच्चीस करोड़ अन्य व्यवस्था द्वारा, तो क्या यह कानून न्यायोचित है कि इस पांच करोड़ के लोगों को कानून को अन्य पच्चीस करोड़ पर भी लागू किया जाए? मैं कहता हूँ कि यह बिल्कुल गलत है। मेरा कहना है कि जन्म द्वारा अधिग्रहण का अधिकार एक हिंदू पुत्र का एक मूल्यवान अधिकार है। यह ऐसा अधिकार है, जो पिता के खर्चीली और धन लुटाने की प्रवृत्ति के कारण दिया गया है। इसी मूल्यवान अधिकार से हजारों हिंदू परिवारों की सम्पत्ति बच सकी है। अब इसी अधिकार को इस अनर्थकारी कानून की धारा 86 के अनुसार हटाया जा रहा है। न केवल यही, धारा 87 में यह व्यवस्था है कि इस अलग कानून के प्रभावी होने से प्रत्येक संयुक्त परिवार का अनिवार्य रूप से विघटन होगा। अतः एक अनिवार्य बँटवारा क्या करना चाहिए? मेरा कहना है कि ये प्रावधान साधारण प्रकृति के नहीं हैं_