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वे एक क्रांतिकारी और अतिवादी प्रकृति के हैं और निश्चित ही ऐसा कोई कारण नहीं है कि इस व्यापक प्रवृत्ति वाले परिवर्तनों को लागू क्यों करना चाहिए।
अब मैं एक बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान पर आता हूँ, जो इस विधेयक में शामिल किया गया है जिसे विवाह के विघटन के तौर पर जाना जाता है। इसके बारे में धारा 30 में उल्लेख है। इसमें वे आधार हैं, जिनसे विघटन हो सकता है। इससे संबंधित अन्य धारा 33 में वे आधार दिए गए हैं, जिने आधार पर कोई भी पार्टी विवाह से न्यायिक पृथकता का दावा कर सकती है। तत्पश्चात् इसमें एक विवाह को अमान्य अथवा अमान्यकरण् ाय घोषित करने के प्रावधान दिए गए हैं। जहाँ तक हिन्दू कानून और हिन्दू समाज का संबंध है, ये प्रावधान नितान्त नए हैं। वस्तुतः कानून के इस प्रावधानों और कानून के अन्य प्रावधानों को इस विधेयक में शामिल करके वकीलों के लिए एक स्वर्ग का निर्माण किया गया है। किसी विवाह को अमान्य घोषित कराने के लिए मामले को न्यायालय में लाया जा सकता है। विवाह को समाप्त घोषित कराने के लिए पार्टियां न्यायालय की शरण ले सकती हैं। न्यायिक रूप से अलग होने के लिए वे न्यायालय में जा सकते हैं। अनेक यूरोपीय देशों में विवाह के विघटन के मामलों से हमने क्या सबक सीखे हैं? यह वास्तव में बहुत आश्चर्यजनक और विस्मयकारी है कि पश्चिमी देशों के अनुभव और अमेरिका तथा इंग्लैण्ड के अनुभव, जहाँ प्रत्येक छह विवाहों में से एक विवाह का विघटन होता है, से हमने कोई सबक नहीं सीखा है। हमारे समाज में किसी भी स्तर पर, हमारी यह स्थिति नहीं है कि हमें अनिवार्य रूप से न्यायालय की शरण लेने की शुरुआत करनी चाहिए। धारा 34 में व्यवस्था है कि प्रत्येक विवाह का विघटन केवल जिला अदालतों के माध्यम से हो सकता है और इसमें यह भी व्यवस्था है कि विघटन का प्रत्येक मामला धारा 44 के अंतर्गत पुष्टि के लिए स्वतः उच्च न्यायालय को जाना चाहिए। मैं पूछता हूँ कि क्या इससे वकीलों के समृद्ध होने का रास्ता नहीं खुल रहा है? क्या किसी कानून को समाज में अधिकाधिक मुकदमेबाजी को बढ़ावा देना चाहिए? अतः, मेरा कहना है कि न्यायिक रूप से पृथक होने और विवाह के विघाटन के लिए धारा 30 और 33 में दिए गए प्रावधान न केवल हिंदू समाज के स्वीकार्य आदर्शों का विरोध करते हैं, घूम-फिर कर वे हमारी सभ्यता और संस्कृति का भी विरोध करते हैं। वे प्रत्यक्षतः सांस्कारिक विवाह के विरोधी हैं, क्योंकि यह एक संविदात्मक संबंध नहीं हैं, जिसे किसी भी पार्टी द्वारा अपने इक्कीपन और सनक से समाप्त किया जा सकता है, बल्कि यह विवाह का पवित्र बंधन है, जिसकी जड़ें हमारे अतीत में हैं और जिसका प्रभाव भविष्य में भी दिखाई देगा। यही हिन्दू विवाह की अवधारणा है। न्यायिक पृथक्कीकरण और विवाह के विघटन के ये प्रावधान हमारी वैवाहिक अवधारणा के बिल्कुल विरोधी हैं और अभी भी जबकि पश्चिमी देश जो इस तरह के वैवाहिक संबंधों, तलाक और ऐसा ही सब, कुछ के आदी हैं-से ऊब जाते हैं, और जब उनके विद्वान विचारक भी इस व्यवस्था को समाज के लिए घातक समझ रहे