598 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हैं, तो यह वास्तव में आश्चर्यजनक बात है कि हम इसका अनुकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। अतः मेरा कहना है कि आपको बहुत सावधान रहना चाहिए। यों न्यायिक रूप से अलग होने के कारण क्या हैं? एक परगमन का मामला लें इसमें कानून कहता है कि वैवाहिक संबंध न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह के विघटन द्वारा समाप्त किए जा सकते हैं। किन्तु दम्पत्ति में इस बीमारी के कीटाणु भी हो सकते हैं और मैं सादर सदन का ध्यान इस ओर दिलाना चाहूँगा कि क्या यह एक तथ्य नहीं है कि यदि आपस में झगड़ा हो जाता है-साधारणतया परिवारों में अक्सर झगड़े हो भी जाते हैं-तो यदि विधेयक में ये प्रावधान रहते हैं, तो वे दम्पत्ति को किसी भी समय झगड़े के लिए प्रोत्साहित करेंगे अथवा यहाँ कि वे झगड़ों के हल के लिए न्यायालय की शरण लेंगे और महोदय, यह निम्नस्तरीय है-कि एक महिला अपने पति पर और एक पति अपनी पत्नी पर बड़ी आसानी से परगमन का आरोप भी लगा दे और हर ओर ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो परिवारों को विघटित करना चाहते हैं। इस तरह अत्यंत तुच्छ कारणों का परिणाम यह होगा कि तलाक के मामले सामने आ जाएँगे। हमारा समाज अनेक शताब्दियों से अनेक आक्रमणों के बाद भी टिका रहा है और आक्रमणों के होते हुए भी विश्व में एक आदर्श संस्था के रूप में सफलतापूर्वक खड़ा हुआ है, जिसका कारण ‘पवित्र भक्ति’ की अंतर्निहित व्यवस्था है। और ये प्रावधान उन समुदायों की भी सहायता नहीं करते, जो अपने रिवाज के अनुसार तलाक का सहारा लेते हैं। ये प्रावधान बड़ी बाधाएं उत्पन्न करते हैं और उन्हें न्यायालय की शरण में जाने के लिए मजबूर करते हैं। ये हमारी संस्कृति और सभ्यता और आदर्श वैवाहित जीवन के हमारे स्वीकार्य आदर्शों के विरोधी हैं। एक तर्क हमेशा दोहराया जाता है, कि इस उपाय के संबंध में कुछ भी मूलभूत अथवा क्रांतिकारी नहीं है, और विवाह तथा तलाक संबंधी प्रावधान एक पारस्परिक अनुमति और समर्थन करने वाली प्रकृति का है। यदि ऐसा है, तो धारा 5 और 51 तक इन सभी प्रावधानों को हटा दिए जाए और विधेयक में यह धारा जोड़ दी जाए कि प्रत्येक हिन्दू इतना सक्षम हो सके कि वह अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर सके। यही एक समर्थन देने लायक हल भी होगा। वह व्यक्ति बहुत अच्छी तरह से, अपने जोखिम पर, अपनी बहन से भी विवाह कर सकता है। अतः इतने सारे अनुच्छेदों के साथ एक इतने व्यापक विधेयक की कोई उपयोगिता नहीं है। क्यों न इनहें समाप्त कर दिया जाए और एक सामान्य अनुच्छेद की व्यवस्था की जाए, जो एक आदर्श एवं सरल बात होगी साथ ही यह उस सभ्यता और परिवेश के लिए भी एक आदर्श होगा, जिससे हम गुजर रहे हैं। अतः मेरा कहना है कि हिंदू पूर्वी दृष्टिकोण से ये प्रावधान पूर्णतः अरुचिकर हैं, अतः उन्हें इस प्रकार के किसी विधेयक में शामिल नहीं किया जा सकता और न ही बर्दाशत किया जा सकता है।
मैं अगले मुद्दे पर आता हूँ। इस विधेयक के प्रावधानों में, धारा 91 अपेक्षित धारा है-एक महिला को चाहे विरासत के द्वारा अपने पिता से अथवा ससुर से अथवा किसी