भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 615

600 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पुत्री से उसकी पैतृक सम्पत्ति लेने के कल्पना भी नहीं कर सकते। इस प्रकार हस्तांतरण के नियमों का सम्पूर्ण ताना-बाना हिन्दू विरोधी विचारों पर आधारित है। यदि श्री भारती थोड़ा कष्ट करके उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में जाएं, तो उन्हें यह देखकर आश्चर्य होगा कि, माता-पिता की बात तो छोड़ ही दें, एक गांव के निवासी उस दूसरे गांव में पानी तक नहीं पीते, जहाँ उनके गांव की बेटी ब्याही गई हो।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः मुझे बताया गया है कि वे ऐसे गांवों में जाते ही नहीं हैं।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः अस्तु सम्पत्ति हस्तांतरण संबंधी नियमों में माता-पिता के बाद, एक स्त्री की सम्पत्ति पाने का हक अन्य किसी व्यक्ति को है? इसके लिए व्यवस्था है कि सम्पत्ति पति के रिश्तेदारों को जाए। यह भी घृणास्पद है, क्योंकि इससे परिवारों से पुश्तैनी दुश्मनी उत्पन्न होगी। यदि पुत्री को अपने पिता से सम्पत्ति मिलनी है, तो पति के रिश्तेदारों को वह सम्पत्ति क्यों मिलनी चाहिए?

इसीलिए तो हमारे कानून निर्माताओं ने ‘स्त्री धन’ की अनेक श्रेणियां बनाई हैं, जो संबंधियों की विभिन्न श्रेणियों के अनुसार है। पर आप हमारे कानून-निर्माताओं, जिन्होंने वे महत्वपूर्ण प्रावधान बनाएं के उच्चतर उद्देश्यों को समझ पाने में सक्षम नहीं हैं, और आप केवल उन्हें सरल बनाने के लिए उनके आदर्शों को कुर्बान कर देना चाहते हैं। ‘स्त्रीधन’ की हमारी स्वीकार्य धारणाओं के अनुसार, यदि पिता की ओर से सम्पत्ति प्राप्त हुई हो, तो पिता के रिश्तेदार उसके हकदार होते हैं। तो इसी तरह का कोई प्रावधान अनुच्छेद 106 से 109 में शामिल क्यों नहीं किया जाता। वह हिन्दू विचारधारा को अधिक स्वीकार्य होगा।

अब मैं विधायक के अन्य प्रावधानों पर आता हूँ। जिस दिन से यह विधेयक प्रभावी होगा, सम्पत्ति के संयुक्त अधिभोग को सामान्य अधिभोग में परिवर्तित मान लिया जाएगा। विधेयक की धारा 115 में एक प्रावधान यह किया गया है कि प्रत्येक वारिस को छूट दी गई है कि वह न्यायालय की शरण ले सकता है पारिवारिक सम्पत्ति के बंटवारे का दावा कर सकता है। क्या यह प्रावधान उन परिवार में शांति बनाए रखने और उसके रखरखाव में सहायक सिद्ध होगा? पिता की मृत्यु के बाद, पुत्री, पुत्र, एक पूर्व-मृत पुत्र की पत्नी इत्यादि न्यायालय की शरण लेंगे और अनुच्छेद 115 में उल्लिखित अपेक्षानुसार बंटवारे का दावा करेंगे। यह इस्लामिक कानून की तरह होगा, जो पूरी तरह हिंदू विचारधारा का विरोधी है और यहाँ इस प्रकार के किसी विधेयक में सहन नहीं हो पाएगा।

यह दावा किया जाता है कि यह संहिता मतभेद सुलझाएगी, क्योंकि यह एक ऐसा व्यापक कानून होगा जो हिंदूधर्म की प्रत्येक व्याधि का उपचार कर देगा। क्या इस विधेयक में कोई त्रुटियां नहीं हैं और जब तक उनमें सुधार किया जाएगा, क्या वे हिंदूसमाज को छिन्न-भिन्न नहीं कर देंगी? धारा 88 और 89 के अंतर्गत, आप धर्मनिष्ठ बाध्यताओं के