भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 616

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सिद्धांतों का निराकरण कर सकते हैं। धारा 89 के अंतर्गत आपने व्यवस्था की है कि संयुक्त परिवार के बकाया शुल्कों का भुगतान परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाएगा। यदि पिता की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में आपने क्या प्रावधान किया है? अंतिम संस्कार के खर्चों को कौन वहन करेगा अथवा श्राद्ध की व्यवस्था कौन करेगा, अथवा ऐसे अवसरों से जुड़े अन्य धर्मार्थ कार्यों के लिए खर्च कौन वहन करेगा। एक बार इस संहिता को संविधान में शामिल किए जाने पर क्या विभिन्न वारिसों के बीच कोई झगड़ा और पुश्तैनी दुश्मनी नहीं होगी? एक पिता की मृत्यु के बाद प्रत्येक पुत्र और पुत्री अपने पिता की सम्पत्ति को हजम करने में इतने व्यस्त हो जाएँगे कि वे श्राद्ध आदि करने के अपने उन कर्तव्यों को भूल जाएंगे, जो किसी सम्मानीय परिवार के लिए अनिवार्य है। इस संबंध में विधेयक में कोई प्रावधान ही नहीं किया गया है।

क्या यह संहिता हिंदू संयुक्त परिवार के लिए है? हिंदू कानून में सहसमांशिता वाली सम्पत्ति और संयुक्त परिवार वाली सम्पत्ति में अन्तर है। भारत में ऐसे कितने सारे परिवार हैं, जो अपना व्यवसाय कर रहे है? क्या विधेयक में उनके लिए कोई प्रावधान है? संयुक्त परिवार के अंतर्गत व्यवसाय में वसीयत कैसे की जाएगी?

आप इस संहिता की व्यापकता का दावा करते हैं। क्या आपने एक दत्तक पुत्र के लिए कोई व्यवस्था की है? धारा 52 से 54 के अंतर्गत 18 वर्ष की आयु पूर्ण करनेवाला एक हिंदूयुक्त अपनी पत्नी की सहमति से एक पुत्र गोद ले सकने का पात्र है। पुत्र गोद लेने के बाद यदि एक पिता के अपने यहां एक पुत्र हो जाता है, तो पैतृक सम्पत्ति में उस पुत्र के क्या अधिकार होंगे? क्या आपकी संहिता इस समस्या के हल का कुछ सुझाव देती है? हमारे हिंदू कानून-निर्माताओं अथवा स्मृतिकारों ने देश के विभिन्न भागों के लिए पर्याप्त प्रावधान किए हैं। पिता द्वारा एक पुत्र को गोद लेने के बाद यदि उसके परिवार में पुत्र का जन्म होता है, तो इस संहिता में क्या स्थिति होगी?

‘रामभाग’ में उसे आधा हिस्सा मिलता है, ‘मिताक्षर’ में उसे एक तिहाई और बॉम्बे प्रोसिडेंसी में उसे एक चौथाई हिस्सा मिलता है? इस बारे में आपने क्या प्रावधान किया है? यदि नहीं, तो क्या यह भ्रम उत्पन्न नहीं करेगा और वह भी दुखदायी भ्रम। क्या आपने संयुक्त परिवार की सम्पत्ति के बंटवारे का तथा कई अन्य बातों का प्रावधान किया है, जो हिंदू कानून की शाखाओं के लिए अनिवार्य और जटिल है? अतः मेरा सादर यह कहना है कि यह विधेयक ऐसी समस्याएँ और प्रश्न उत्पन्न करेगा, जिनका उत्तर देना बहुत कठिन होगा।

तो प्रश्न यह उठता है कि उस पुत्र के अधिकार और कर्तव्य क्या होंगे, जिसका संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं है। वर्तमान परिस्थितियों में, एक पुत्र अपने जन्म के साथ ही सम्पत्ति में अधिकार पा लेता है और वह एक ऐसा कवच है जिसे वह अपने रहन-सहन शिक्षा और अन्य बातों के लिए उपयोग कर सकता है। आप