भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 617

602 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मुझे अपने विधेयक की धारा 126 और 128 के प्रावधानों की जानकारी दे सकते हैं, जिनमें उल्लेख है कि प्रत्येक पति का कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी की देखभाल करें, और पत्नी उससे किसी आधार जैसे कुष्ठरोग आदि के कारण अलग गुजारा भत्ते देने का दावा कर सकती है। इससे मुकदमेबाजी के लिए रास्ता खुल जाता है और वकीलों की चांदी हो जाती है। और धारा 128 में, आप कहेंगे कि बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता के सिर गुजारे का प्रावधान किया गया है। किन्तु धारा 126 और 128 के अंतर्गत क्या आपने बड़े प्रभावी ढंग से उनके अधिकारों की रक्षा की है? मेरा कथन है कि नहीं की है। अपने उन्हें उस स्थिति से भी बदतर स्थिति में रख दिया है, जो उन्हें वर्तमान हिंदू कानून में प्राप्त है। वर्तमान हिंदू कानून के तहत एक पुत्र को विरासत में यह अधिकार मिलता है कि वह पारिवारिक सम्पत्ति में से अपना गुजारा कर सकता है, और यदि पिता अथवा प्रबंधक अथवा परिवार के कर्ता कर्तव्यपरायण नहीं हैं और पुत्र के हितों की नहीं सोचता तो वह पुत्र समस्या के हल के लिए न्यायालय में जा सकता है। यहाँ तक कि वह बँटवारे का दावा भी कर सकता है। हिंदू कानून का प्रत्येक विद्यार्थी यह जानता है कि चूंकि हिंदू कानून में एक अवयस्क को बंटवारे के दावे के संबंध में बहुत सीमित अधिकार प्राप्त हैं, यदि पिता अथवा प्रबंधक अथवा परिवार का कर्ता अवयस्क को क्षति पहुंचाने और उससे द्वेष के कारण अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है, तो उस अवयस्क के लिए कानून का रास्ता खुला होता है और वह अपने बंटवारे के लिए अधिकार को लागू कराने के लिए न्यायालय की शरण में जा सकता है। यह एक मूल्यवान अधिकार है और यहाँ आप उस मूल्यवान अधिकार को छीन रहे हैं।

इसी प्रकार आप कहते हैं कि धारा 126 में आपने पत्नी के रहन-सहन के लिए तथा धारा 128 में बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता के रहन-सहन के लिए प्रावधान किए हैं। यदि किसी पति के पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है, यदि वह कमा नहीं सकता, यदि उसके पास अपने गुजारे के लिए भी कुछ नहीं है, तो वह अपनी पत्नी को कैसे पाल सकता है? अतः मैं कहता हूँ कि पत्नी को दिया गया यह कृत्रिम अधिकार एक शर्म की बात है और एक कागजी अधिकार भर हैं। वर्तमान हिंदू कानून में प्रत्येक पत्नी को अपने रहने और गुजारा करने संबंधी बहुमूल्य अधिकार प्राप्त हैं। और यदि प्रबंधक अथवा कर्ता इस अधिकार का दुरुपयोग करता है, तो वह न्यायालय के माध्यम से अपना अधिकार प्राप्त कर सकती है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः भले ही उसके पति के पास एक फूटी कौड़ी न हो।

पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः मैं संयुक्त परिवार की सम्पत्ति की बात कर रहा हूँ। यदि आप एक छोटे से कानून के द्वारा निर्णय लेते है तो मामला अलग होगा कि सम्पत्ति का हरेक हिस्सा गायब हो जाना चाहिए और प्रत्येक सम्पत्ति का समाजीकरण और राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। किन्तु, संयुक्त परिवार को बनाए रखते हुए, आप अवयस्कों,