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विधवाओं, और महिलाओं को उनके उन बहुमूल्य अधिकारों से वंचित कर रहे हैं, जो वर्तमान हिंदू कानून में विद्यमान है। समानता, जो कि एक ढोंग है, और कागशी समानता के नाम पर आप एक गलत काम कर रहे हैं, जिसे ठीक कर पाना बहुत कठिन होगा। अतः मेरा कहना है कि इस छोटे से कानून की हर दृष्टिकोण से जांच करना न केवल हिंदूकानून के स्वीकार्य सिद्धांतों का विरोध करना है, अपितु हिंदू समाज में एक ऐसा भ्रम उत्पन्न करने को बाध्य होने जैसा है, जिससे उबरना अथवा ठीक कर पाना बहुत कठिन कार्य है।
श्रीमान्, इससे पहले मैं अपनी बात समाप्त करूँ मैं सार रूप से बताना चाहता हूँ कि 2 अप्रैल को और आज मैंने क्या कहा है। मैंने कहा था कि हिंदू कानून के संहिताकरण की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है और न ही इसकी कोई इच्छा व्यक्त की गई है। यह न तो आवश्यक है न ही अपेक्षित। देश की न्यायिक राय के अनुसार इसकी कोई अपेक्षा भी नहीं की गई है। इसके इस प्राधिकार को लेकर कोई मतभेद नहीं हैं कि इसके लिए विधायिका के हस्तक्षेप के अधिकार की आवश्यकता पड़ती हो। इस प्रकार के उपाय के लिए जनता को कोई मांग भी नहीं है। राउ समिति ने जिन साक्ष्यों का सहारा लिया, मैंने उनका मात्रात्मक विश्लेषण अपने 2 अप्रैल के अभिभाषण में किया था और मैंने कहा था कि राउ समिति के विधेयक में शामिल प्रत्येक नवीन विचार और परिवर्तन को लेकर, राउ समिति द्वारा दर्ज साक्ष्य में ली गई राय का जबरदस्त विरोध हुआ था, जिसे वर्तमान हिंदू संहिता विधेयक में और ज्यादा बिगाड़ दिया गया है जैसा कि प्रवर समिति के कार्य में भी प्रतीत होता है। तलाक के प्रश्न पर, सांस्कारिक सह-सिविल विवाह के मामले में, प्रत्येक बिंदु पर, धारा 21 के अंतर्गत पारंपरिक विवाह के संबंधित व्यक्ति की इच्छा का सहारा लेकर सिविल विवाह में तब्दील करने को बाध्य किया जा रहा है, जिसका विरोध हुआ है और देश के कोने-कोने से विरोध हुआ है। कोने-कोने से प्राप्त यह अभूतपूर्व राय संयुक्त परिवार को समाप्त करने के विरोध में था। अतः प्रत्येक महत्वपूर्ण बिंदु पर, अधिकांश सम्मतियाँ राउ समिति विधेयक के विरोध में थीं। अब भी, देश के कोने-कोने से, न्यायिक क्षेत्रों से, बार-एसोसिशनों से, अन्य नागरिकों से जो रुझान मिलते जा रहे हैं, वे सभी समान रूप से एक ही राय रखते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों मैं इस प्रकार के क्रांतिकारी उपाय की कोई आवश्यकता नहीं है। अतः, मैंने कहा था और में आज पुनः दोहराता हूँ कि हिंदू कानून का संहिताकरण न तो इच्छित है न ही आवश्यक।
मैंने यह इंगित किया है कि विधेयक में उल्लिखित विवाह के प्रावधान, विवाह के लिए भ्रमात्मक हैं। यह वस्तुतः सांस्कारिक विवाह के वेश में हिंदू संहिता में इस्लामिक और ईसाई विवाहों के सिद्धांतों की शुरुआत हैं। किसी भी हिंदू के लिए यह शर्मनाक होगा कि वह इस प्रकार विवाह करे जो किसी अन्य की इच्छा के अनुसार बदलकर एक सिविल विवाह में बदल दिया जाए। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
श्री एस. नागप्पाः यह विधेयक सांस्कारिक विवाहों पर रोक नहीं लगा रहा।