604 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः मैं आपके तर्क का पहले ही उत्तर दे चुका हूँ। यह ऐसा तर्क है, जिसे सदन में और बाहर अक्सर दोहराया जाता है, कि यह एक अधिकार देने वाला, एक अनुमति देने वाला उपाय है। यदि ऐसा है, तो सब कुछ समाप्त कर दिया जाए और विधेयक में एक बहुप्रयोजनीय धारा रखी जाए कि कोई भी किसी से भी विवाह करने के लिए सक्षम है। इससे आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी। आपने सांस्कारिक विवाह को कामोत्तेजक बना दिया है? आपने विधेयक में सांस्कारिक विवाह का जो चरित्र उपलब्ध कराया है, वह उपहास मात्र है, सांस्कारिक विवाह के प्राचीन मूल्यों का अपमान है। यह केवल यथार्थ के प्रति लोगों को धोखा देने जैसा है, उन्हें यह ऐसा विश्वास दिलाने जैसा है कि यह स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है। यह एक कृत्रिमता है, जो हिंदू समाज के प्रति अपराधकर्म करने जैसा है। कोई भी स्वाभिमानी हिंदू शायद ही इस व्यवस्था को बर्दाश्त कर पाए। अतः बेहतर होगा कि धारा 5 से 52 तक में उल्लिखित प्रावधानों को हटा दिया जाए। ये पूर्णतया हिंदू विचारध, हिंदू संस्कृति और हिंदू सभ्यता के विरुद्ध है। विवाह के इन प्रावधानों के संबंध में यही मेरा कथन है। जहाँ तक तलाक की धाराओं का संबंध है, मैं पहले ही अपनी बात रख चुका हूँ। दत्तकग्रहण के बारे में, मैंने कहा था और आज भी वही बात दोहराई है कि दत्तकग्रहण की अवधारणा हिंदू कानून की उपज है, और इस आधुनिक युग में, आप जिन्हें अपने विकसित विचार कहते हैं, यदि आप दत्तकग्रहण को आदर्श नहीं मानते हैं, तो दत्तकग्रहण की अवधारणा को पूरी तरह समाप्त कर दें। किन्तु आपने इस बारे में अनाप-शनाप व्यवस्था की है दत्तकग्रहण के लिए वैसी अवधारणा की व्यवस्था न करें। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक हिंदू, एक पुत्र गोद ले सकता है। इसमें गोत्र का कोई प्रतिबंध नहीं है, जाति का कोई प्रतिबंध नहीं है, प्रतिष्ठा का कोई प्रतिबंध नहीं है, और यह व्यक्ति-विशेष पर छोड़ दिया गया है कि वह किसी को भी गोद ले सकता है। पर जिन्हें, हिंदू कानून की संहिताओं की पूर्ण जानकारी है, वे भली-भांति जानते हैं कि परिवार में किसी अजनबी को गोद लेकर आने के लिए कानून के क्या स्रोत हैं। न्यायिक निर्णयों की पवित्रता और प्राधिकार के पीछे पूर्णतः स्थापित रीति-रिवाज और प्रथाएं हैं। जिनमें समान गोत्र का एक परिवार का केवल एक सदस्य गोद लिया जा सकता है। यह कदम उठाए जाने पर घातक परिणामों की परवाह किए बिना, उन सभी प्रथाओं_ उन सभी स्थापित रीति-रिवाजों को आसानी से विदा किया जा रहा है। इस प्रकृति वाले प्रावधान के पालन की बाध्यता के बहुत भयानक परिणामों को सोचकर ही मैं सिहर उठता हूँ। इस तरह की गोद लेने की प्रक्रिया की व्यवस्था करने की बजाय बेहतर होगा कि इस प्रक्रिया को समाप्त ही कर दिया जाए। वस्तुतः मुझे यह टिप्पणी करने की अनुमति दें-और मैं पूर्ण जिम्मेदारी के साथ यह कहता हूँ-कि इस विधेयक के प्रायोजकों में हिंदू संस्कृति से संबंधित हर बात के प्रति एक अन्तर्निहित विरोध एक अन्तर्निहित विद्वेष है, और इसी कारण हम देखते है कि इस प्रकार के प्रावधान, कोई विचार किए, बिना और यह जाने बिना कि दत्तकग्रहण की