भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 620

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अवधारणा के पीछे हिंदू कानून-निर्माताओं की क्या मंशाए थीं, इस विधेयक में शामिल किए जा रहे हैं। हिंदू कानून के अंतर्गत दत्तकग्रहण का एक-मात्र उद्देश्य यह था कि कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु के पश्चात् किए जाने वाले धार्मिक कृत्यों की पूर्ति के लिए एक पुत्र पा सकता था। दत्तकग्रहण की अवधारणा का एकमात्र उद्देश्य यही था किन्तु यह व्यवस्था करके कि किसी भी ऐसे-गैरे का दत्तकग्रहण किया जा सकता है, आप इस अवधारणा की जड़ ही काट रहे हैं। अतः, ऐसा कोई प्रावधान न करें। बेहतर है कि दत्तकग्रहण की अवधारणा की समाप्त कर दें। अनेक समाजों में यह व्यवस्था है ही नही। यदि आप इस व्यवस्था के इतने शत्रु हैं, तो इसे अनंतकाल तक जारी रखने की जरूरत क्या है? अतः दत्तकग्रहण अवधारणा का उपहास बिल्कुल न करें।

महोदय, मैं बताना चाहूँगा कि इस विधेयक में प्रत्येक प्रावधान पर एक ऐसा लांछन है जो हिन्दू-विरोधी है और इसलिए किसी भी हिंदू को यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। अतः मेरे लिए तो यह विधेयक इसके प्रायोजकों के द्वारा किया गया एक कपटपूर्ण प्रयास है, जिसमें हिंदूओं को उनकी भारतीय परम्पराओं से दूर अरब और जेरूसलम के तरीके सिखाने का प्रयास है। तो इस तरह की हिंदू संहिता की आवश्यकता क्या है? आप कलम की एक नाक से पूरे हिंदू समुदाय के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियिम, 1925 के प्रावधानों का विस्तार क्यों नहीं करते? यह सुविधाजनक और सरल तरीका-और हम सरल संविधान के प्रति बहुत आसक्त हैं-हमारे पूरे हिंदू समाज के लिए उपलब्ध कराना भी बहुत ही सरल होगा।

इससे पहले कि मैं अपनी बात समाप्त करूँ, मैं सोचता हूँ कि यह मेरा कर्तव्य है, और एक सत्यनिष्ठ कर्तव्य है कि मैं इस बारे में एक चेतावनी वाली टिप्पणी भी करूँ। आप बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि हिंदू कानून एक ऐसा कानून है, जो कहीं बाहर से नहीं आया है। यह ऊपर से नहीं थोपा गया है, यह एक अलौकिक शक्ति का सृजन नहीं है, यह किसी राजा अथवा विधायिका के हुक्मनामे का परिणाम नहीं है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। यह पिछली कई शताब्दियों से होने वाला स्वाभाविक विकास है। इसमें स्मृतियां और प्राचीन पुस्तकों के मूल पाठों द्वारा काननों का सृजन नही हुआ है_ उनमें केवल हिंदू कानून के स्वीकृत सिद्धांतों का उल्लेख और व्याख्या की गई है किन्तु जैसा कि उन सिद्धांतों के बारे में मूल पाठों में पढ़ा भी जा सकता है, वे हिंदू समाज को चलाने वाली शक्ति कभी नहीं रहे हैं। हिंदू समाज को चलाने वाली शक्ति है, उसकी सतत् विकसित होती प्रथाएं और रीति-रिवाज और, वे भी समाज के विभिन्न वर्गों को चला रहे थे। यह विकास स्वाभाविक भी था। वस्तुतः, यह यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखें, तो हिंदूसमाज इस सदन की भांति कुछ निर्वाचित व्यक्तियों की तरह काम नहीं करता, बल्कि लगातार सत्रों में काम करने वाली पूरे समाज की विधायिका है, जो आवश्यकतानुसार अपने कानून को संशोधित और संगठित करती है। यही हिंदू कानून की सर्वोच्य सुंदरता है। और अब उसी को आप विकृत कर रहे हैं, उसे एक छोटा-सा कानून बनाकर तोड़ रहे हैं, जिसके लिए