606 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
समाज की सदैव परिवर्तनशील परिस्थितियों से इसकी अनिवार्यता, नम्यता, गतिशीलता, स्वाभाविकता और स्वीकार्यता छीन रहे हैं। महोदय, इस सदन का एक विनम्र सदस्य होने के नाते, यह बताना मेरा कर्तव्य है कि इसमें हस्तक्षेप करने से पहले आपको अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए। हमारे कानून का प्रादुर्भाव सदियों के विकास का परिणाम है और इसके पुरातन संस्थानों, रिवाजों और प्रथाओं के साथ हस्तक्षेप करने से पहले आपको एक बात अवश्य दिमाग में रखनी चाहिए। हमारा भारत इलाहाबद और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में नहीं बसता है। असली भारत पांच लाखो गांवों में बसता है। ग्रामीणों का जीवन अपने समाज के ताने-बाने में इतने करीब से गुंथ चुका है कि इस नए कानून के द्वारा आप जो भी संशोधन करें, उनसे उनकी पुरातन प्रथाओं, रिवाजों, जिनका वे सदियों से पालन कर रहे हैं, के छिनने से पहले वे अपनी पूरी शक्ति लगाकर उसका विरोध भी करेंगे। हिंदू समाज का कोई भला किए बिना, आप केवल कुछ असंतुष्ट व्यक्तियों का मार्ग प्रशस्त करेंगे जो इस नवीन कानून का लाभ लेना चाहते हैं।
डॉ. मोन मोहन दास (पं. बंगाल)ः क्या वह इस सदन के कुछ सदस्यों पर आरोप नहीं लगा रहे हैं? उन्होंने एक ही बात को कोई बार दोहराया है।
पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः मैंने इस सदन के किसी सदस्य का जिक्र नहीं किया है। मेरे माननीय मित्र को सामने वाले के विचार सुनने के लिए सब्र और सहनशीलता रखनी चाहिए। मेरा कहना यह है कि आप इस छोटे से कानून से हिंदू कानून की स्वाभाविक वृद्धि और विकास को रोक नहीं सकते और यदि आप इसे पारित करते हैं, तो आप हिंदू कानून में कुछ जोड़ने की बजाय इसकी सुंदरता को बिगाड़ देंगे। यह छोटा-सा कानून अपनी प्रकृति में इतना विघटनकारी और विनाशकारी है कि इसे व्यवहार में लाने के प्रति एक रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने की कल्पना तक मुश्किल है। माननीय प्रधानमंत्री और सदन के नेता ने कल यह सुझाव दिया था कि हमें एक औपचारिक अथवा अनौपचारिक बैठक में करना चाहिए ताकि यह विचार हो सके कि किन परंपरावादी और गैर-परंपरावादी अनुच्छेदों पर सहमति बन सकती है। इस मुद्दे पर मैं उनके साथ हूँ। किन्तु मैं सोचता हूँ कि विधेयक की रचना एक मानसिक और मनोवैज्ञानिक नजरिये के साथ की गई है, जो हिंदू विचारधारा के लिए पूरी तरह असंगत और अस्वीकार्य है। फलस्वरूप, इस उपय के लिए एक रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने के हमारे सतत् प्रयासों के बावजूद, ऐसा करना बहुत कठिन होगा। इसे अपनाने के लिए सरकार के पास सबसे सुरक्षित तरीका इस उपाय को रोक देना होगा और वयस्क मताधिकार के द्वारा चयनित विधायिका के साथ-साथ हिंदू समाज के संपूर्ण ढांचे को बदलने के लिए निर्वाचन के द्वारा एक शासन देश के साथ एक अधिक उपयुक्त समय की प्रतीक्षा की जा सकती है। मैं कहता हूँ कि जब तक ऐसा शासनादेश नहीं मिल जाता, और मेरा प्रश्न है और यह तीखा प्रश्न इस कानून उपयुक्तता के बारे में है ताकि हिंदू समाज के इस अत्यावश्यक महत्व से संबंधित उपाय से निबटा जा सके।