भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 622

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इन्हीं शब्दों के साथ, महोदय, मैं अपनी बात को विराम देकर अपनी सीट पर जा रहा हूँ।

श्री लोकनाथ मिश्रा (उड़ीसाः सामान्य)ः एक व्यवस्थागत आपत्ति है। यद्यपि मैं इस विधेयक के विचार-विमर्श का विरोध नहीं करना चाहता, मैं सोचता हूँ कि जो संविधान हमने हाल ही में पारित किया है, के कारण इस विचार-विमर्श को पूर्णतया रोक दिया जाएगा। निस्संदेह, यह तर्क दिया जा सकता है कि वह अभी प्रभावी नहीं हुआ है। किन्तु हम बिल्कुल आश्वस्त हैं कि हम अभी इस विधेयक को पारित नहीं कर रहे हैं और बिल के पारित होने तक संविधान प्रभावी हो ही जाए। यदि आप मुझे अनुमति दें, मैं यह बताने के लिए विस्तारपूर्वक वह कारण भी बता सकता हूँ कि यह विधेयक संविधान के विरुद्ध है।

माननीय उपाध्यक्षः मैंने आपकी आपत्ति को ध्यानपूर्वक सुना है। नया संविधान अभी तक क्रियान्वित नहीं हुआ है। वह अभी प्रभावी नहीं हुआ है। मैं इस प्रश्न पर कोई निर्णय नहीं दूंगा कि यदि यह प्रभावी होता है तो क्या यह इस विधेयक के कानून बनने की राह में रोड़ा बन जाएगा। वर्तमान संविधान के अंतर्गत यह सदन इस विधेयक के आगे बढ़ाने के लिए पूर्णतया सक्षम है।

श्री टी.टी. कृष्णमाचारी (मद्रासः सामान्य)ः इस उपाय की महत्ता और इस तथ्य के मद्देनजर कि बोलना चाह रहे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है, क्या अध्यक्ष महोदय अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए इस मुद्दे पर विचार करेंगे और एक समय-सीमा लागू करेंगे?

कुछ माननीय सदस्यः नहीं, नहीं।

कुछ माननीय सदस्यः हाँ, हाँ।

माननीय उपाध्यक्षः कृपया व्यवस्था बनाए रखें।

श्री एम. तिरुमला राव (मद्रासः सामान्य)ः यह मुद्दा श्री सिधवा द्वारा भी उठाया गया और आपने उसका निपटान भी किया था।

माननीय उपाध्यक्षः मि. सिधवा ने एक अन्य मुद्दा उठाया था। वह जानना चाहते हैं कि क्या सदन में कल यह चर्चा जारी रहेगी और उसके लिए कितना समय निर्धारित किया गया है। मेरा उत्तर है कि यह एक सरकारी विधेयक है और यह सरकार पर है कि वह दिनों की संख्या निर्धारित करे। स्थिति यह है कि अध्यक्ष केवल यह बता सकता है कि किसी विधेयक विशेष पर होने वाली चर्चा पर्याप्त है अथवा नहीं। जहाँ तक इस विधेयक का संबंध है, माननीय सदस्य अच्छी तरह जानते हैं कि कोई समय-सीमा लागू नहीं की जा सकती। (बहुत अच्छा!)।