हिन्दू संहिता - जारी... - Page 625

610 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हिंदू संहिता µ जारी ....

माननीय श्री के. संथानमः श्रीमान् जैसी कि प्रवर समिति ने हिंदू संहिता तैयार की है, मैं तहे-दिल से उसका समर्थन करता हूँ। महोदय, मैं उस कानून की निर्माण-प्रक्रिया के आरंभ से ही इसकी प्रगति को देख रहा हूँ। मुझे राउ समिति के समक्ष गवाही देने का अवसर मिला था कि चूँकि यह संहिता उक्त समिति ने तैयार की है, इसमें अनेक परिवर्तन हुए हैं और, मेरी राय में, इसमें संतुलित सुधार हुआ है।

महोदय, मैं सोचता हूँ कि एक संविधान निर्माता निकाय के रूप में हमने पिछले दिनों जिस महान संविधान का कार्य पूरा किया है, उसके सामाजिक परिवेश में यह हिंदू संहिता मात्र उस कार्य को आगे बढ़ाने जैसा है। महोदय, उक्त संविधान के मूल कारक क्या हैं? यह भारत के एक राजनैतिक शक्ति के रूप में एकीकरण, सशक्तीकरण और सुदृढ़ीकरण पर आधारित है। इसी प्रकार यह विधेयक भी हिंदू समुदाय के एकीकरण, सशक्तीकरण और सदृढ़करण पर आधारित है। महोदय, जब तक हिंदू समुदाय में एकता, सशक्तता और सुद्एता नहीं आती, मुझे नहीं लगता कि जिस महान संविधान का हमने निर्माण किया है, वह सफलतापूर्वक कार्यान्वित हो सकता है।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः तलाक द्वारा एकीकरण होगा?

माननीय श्री के. संथानमः बात यह है कि, राजनैतिक तौर पर आप बहुत विकसित हो सकते हैं, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आप समाजवाद का उपदेश दे सकते हैं, किन्तु तो भी सामाजिक स्थिरता के प्रति आस्थावास होना पूर्णतया असंगत और अवास्तविक है। भारत को सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ना है अथवा बिल्कुल नहीं बढ़ना है और मैं सोचता हूँ कि सामाजिक क्षेत्र में भी परिवर्तन और सुधार उतना ही अपरिहार्य है जितनी राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में हमारी प्रगति।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः विवाह में लोकतंत्र भी?

माननीय श्री के. संथानमः मेरे माननीय मित्र कुछ सकते हैं कि केवल हिंदू समुदाय के लिए एक एकीकृत संहिता की बजाय हम पूरे देश के लिए एक समान संहिता क्यों नहीं बना सकते?

तो, महोदय, जब हम संविधान का निर्माण कर रहे थे तो कई लोग कहते हैं कि हमें प्रान्तों की क्या आवश्यकता है, हम भारत सरकार के अधिनियम के अंतर्गत उक्त निर्माण क्यों कर रहे थे, और हम राजप्रमुखों को क्यों बनाए हुए थे? महोदय, इसके उत्तर में हमारा तर्क था कि जब हम परिवर्तन और सुधार चाहते हैं, तो जहाँ तक संभव है, हम विद्यमान आधारशिलाओं पर, विद्यमान ताकतों और परिवर्तन तथा सुधार करने वाली