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ताकतों के एक न्यायिक सम्मिश्रण का संरक्षण चाहते हैं। यह विधेयक समान सिद्धांत पर आधारित है। यह काफी हद तक हिंदू कानून का संरक्षण करना चाहता है जबकि यह आधुनिक आवश्यकताओं और विचारों के भी अनुकूल है और वहीं परिवर्तन भी करना चाहता है जहाँ ऐसे परिवर्तनों की आवश्यकता है। मैं सोचता हूँ कि केवल यही एक तरीका है कि जिससे पूरा देश और साथ ही हिंदू समाज आंतरिक बाधाओं और हिंसक आंदोलनों के बिना ही प्रगति कर सकता है। महोदय, हमारी नीति एक शांतिपूर्ण और स्वैच्छिक परिवर्तन लाना है और यह विधेयक सामाजिक क्षेत्र में उस शांतिपूर्वक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
महोदय, मैं इस विधेयक की धाराओं की बात नहीं करना चाहता। अभी इसका समय नहीं आया है और यदि हम प्रत्येक धारा पर विचार करेंगे तो यह प्रावधानों विशेष की छानबीन करने जैसा हो जाएगा।
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः वह स्थिति आएगी ही नहीं।
माननीय श्री के. संथानमः ठीक है, देखेंगे।
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः जब तक कि सदन से बाहर खड़े स्तर पर लाठियाँ न चलने लगें।
माननीय श्री के. संथानमः कुछ लोग भविष्यवाणी कर रहे थे कि संविधान कभी पारित नहीं होगा_ किन्तु हमने इसे पारित कर दिया है। उसी प्रकार, हम इस विधेयक को संविधान-पुस्तिका में रखने जा रहे हैं।
महोदय, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि कुछ धाराएं अथवा कुछ भाग मामूली से परिवर्तनों अथवा समायोजनों के लिए ग्रहणशील नहीं हैं।
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः मामूली ढंग से!
माननीय श्री के. संथानमः मैं स्वयं को इस विधेयक में निहित व्यापक सिद्धांतों तक ही समिति रखूंगा, और विवरणों को किसी भावी अवसर के लिए छोड़ दूंगा।
महोदय, इस विधेयक के चार पहलू हैं, अर्थात्, संहिताकरण, एकीकरण, तर्कसंगतता और सुधार।
सार्जेन्ट रोहिणी कुमार चौधरी (असमः सामान्य)ः और जालसाशी भी।
माननीय श्री के. संथानमः देखिए, वह पक्ष मैं आप पर छोड़ता हूँ। जहाँ तक अलग-अलग भागों में दत्तकग्रहण, अल्पसंख्यकों, संरक्षणता और गुशारा आदि का संबंध है, वह मात्र गुजारा आदि का संबंध है, वह मात्र हिंदू कानून का संहिताकरण है।