हिन्दू संहिता - जारी... - Page 628

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पर उन्हें दूसरों की बुराई नहीं करनी चाहिए। उन्हें अपनी सीमा को नहीं लांघना चाहिए, और यदि कोई सदस्य किसी की निन्दा करता है, तो यह गलती ही है।

माननीय श्री के. संथानमः महोदय, मैं व्यावधानों का बुरा नहीं मानता। किन्तु यदि इस विधेयक के विरोधी यह सोचते हैं कि ऐसी चालें चलना उनका एकाधिकार है, तो वे गलती कर रहे हैं। महोदय, मैं पूरे जोर-शोर से यह कहता हूँ कि श्री बी.एन. राउ उसी भांति एक हिंदू हैं, जैसे इस सदन में अन्य लोग हैं और जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं कह सकता हूँ कि मेरे पूर्वज बहुत ही परंपरावादी हिंदू परिवारों से आए है, और अभी तक मैंने कभी मछली का एक टुकड़ा तक नहीं खाया है। और मैं दावा कर सकता हूँ कि अपेक्षाकृत अधिक परंपरावादी भी हूँ...

श्री एच.वी. कॉमथ (सी.पी. एवं बिरारः सामान्य)ः क्या मछली खाना या नहीं

खाना परंपरावादिता की कोई परीक्षा है?

माननीय श्री के. संथानमः हमारे राज्य में मछली खाना सर्वाधिक शास्त्र विरुद्ध समझा जाता है।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः और हमारे राज्य में इटली और रसम खाना सबसे ज्यादा आपत्तिजनक समझा जाता है।

माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य कृपय इटली और मछली की बजाय विवाह और तलाक जैसी ज्यादा स्थायी चीजों की बात करें।

श्री आर.के. सिघवाः हम सदन को मछली बाजार न बनाएं।

माननीय श्री के. संथानमः मैं पुनः कहता हूँ कि जहाँ तक दत्तकग्रहण, संरक्षण, अल्पसंख्या आदि का प्रश्न है, उनमें सिर्फ वर्तमान कानून का संहिताकरण है, जैसा कि ब्रिटिश न्यायालयों के निर्णयों में देखा जा सकता है। महोदय, मनु ने जो कुछ लिखा है, याज्ञवल्कय ने जो कुछ लिखा है, वर्तमान हिंदू कानून वह कानून है जिसकी पिछले एक सौ पचास वर्षों से ब्रिटिश न्यायालयों में व्याख्या की जाती है, और इस व्याख्या के सामने, मनु और यज्ञनवाल्कय भी पूरी तरह से असहाय हैं। अतः हिंदू कानून अब ऐसा कानून है जिसकी व्याख्या और निर्धारण अब इस देश में ब्रिटिश न्यायाधीशों द्वारा कर दिया गया है।

एक माननीय सदस्यः ब्रिटिश न्यायाधीश?

माननीय श्री के. संथानमः ब्रिटिश अथवा उनके रंग में रंगे न्यायाधीश। अतः श्रीमान्, मैं सोचता हूँ कि हम इतने सक्षम तो हैं कि हम उस कानून को बदल सकें जिसे ब्रिटिश न्यायाधाशें ने हमारे प्राचीन कानून को वर्तमान हिंदू कानून में बदल दिया है।

महोदय, अब मैं हिंदू संहिता के आगे पहले इसका एकीकरण वाले भाग पर आता