48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री नजीरुद्दीन अहमदः क्या मैं निवेदन करूं कि मेरे कुछ विचार-बिंदु थे और मैं उनको प्रस्तुत किये जाने का लाभ भी उठाना चाहूँगा और दिये गये जवाब का भी।
माननीय उपाध्यक्षः माननीय सदस्य को बिना किसी चुनौती के अपने कथन का लाभ मिलेगा अगर उसका कोई अवलोकन प्रश्नगत् नहीं होगा।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान मुझे यह पसंद नहीं।
माननीय उपाध्यक्षः मैंने पहले ही आदेश दिया है कि माननीय सदस्य को अभी अपनी पारी नहीं मिलेगी। मैंने श्रीमती रेणुका रे को आमंत्रित किया है।
ऽश्रीमती रेणुका रेः विधेयक जो इस समय इस सदन के समक्ष विचाराधीन है, जिन सिद्धांतों को इसमें मूर्त रूप दिया गया है वह 1943 से इस विधानमंडल के विचाराधीन हैं तथा उन परिवर्तनों के लिए जोर दिया जा रहा है जो इस विधेयक में मूर्त हैं, हमारे देश के सामने बहुत समय से हैं। यह सौ वर्ष से अधिक का समय था जब राजाराम मोहन राय ने एक लेख लिखा था जिसे ‘द राइट्स ऑफ फीमेल्स टू इनहेरिट प्रॉपर्टी एंड देयर राइट्स ऑफ मैरिज’ (महिलाओं के सम्पत्ति के उत्तराधिकार और उनके विवाह के अधिकार) पुकारा गया और यह प्रथम बार जनता के ध्यान में लाया गया था। सन् 1931 और 1932 से देशभर में यह लगातार मांग रही है और इसी के साथ महिलाओं की वैधानिक निर्योग्यताओं के हटाने की आवश्यकता तथा विधिसम्मत एकरूपता और व्यापक वैधानिक संहिता की आवश्यकता भी इस देश में मानी गई थी। इस तथ्य के कारण कि यह मामला विधानमंडल के समक्ष विचाराधीन है, इस संबंध में कई विधेयक इस विषय पर तैयार किए गए थे। इस कारण कि कानूनों को टुकड़ों-टुकड़ों में बनाने का कार्य कानून में विषमताओं को पैदा कर रहा था तथा इसकी मांग जोरों पर थी। उस समय की सरकार पर यह दबाव था कि हिंदू कानून समिति जिसे ‘हिंदु कानून पर राउ समिति’ के नाम से बेहतर जाना जाता है, की नियुक्ति की जाए। यह इस समिति की रिपोर्ट का परिणाम निरर्वसीयती उत्तराधिकार और विवाह पर दो विधेयक 1943 में प्रस्तुत किए गए। उस समय विरोधी, जो अब फिर से अपना सिर उठा रहे हैं, तब भी अग्रपंक्ति में आये थे। उस समय भी विरोधियों की बात का सारांश वही था जो आज है परन्तु तरीका बिल्कुल अलग था। यह तरीका स्वाभाविक रूप से अलग था क्योंकि तब इस सरकार को विदेशी सिद्ध करना था। यह पहुंच इस आधार पर बनायी गयी थी कि वे ऐसे स्वामिभक्त थे जो सरकार के प्रखर समर्थक थे और वह कांग्रेस थी जो विद्रोह कर रही थी, जो उस मांग के पीछे थी जिसे भारत की महिलाओं ने आगे बढ़ाया था और कि सरकार को उसके लिए कोई श्रेय नहीं देना चाहिए था। मैं बिना किसी आधार के यह वक्तव्य नहीं दे रही हूँ। यह कहना है कि इस देश की राष्ट्रीय प्रेस ने विरोधियों
ऽसीए (विधि) डी, खंड 2, भाग II, 25 फरवरी, 1949, पृष्ठ 925-391