हिन्दू संहिता - जारी... - Page 630

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विघटन वाली प्रक्रिया नहीं है अपितु एक समकेन वाली प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया जारी रहेगी और लंबे समय तक चलेगी।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः यह बाहर चल रही है।

श्रीमती जी. दुर्गाबाई (मद्रासः सामान्य)ः यह भीतर भी चल रही है।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः आपकी प्रेरणा से।

माननीय श्री के. संथानमः मैं इस सदन में काफी समय से इन व्यावधानों के कारण चिंतित हूँं।

अब, प्रश्न यह है कि क्या हमें दायभाग या मिताक्षर कानून को प्राथमिकता देनी चाहिए। मेरे मित्र पंडित मुकुट बिहारी लाल ने कहा है कि बीस करोड़ लोग मिताक्षर का पालन करते हैं और पांच करोड़ दायभाग का, तब हम बीस करोड़ लोगों वाले कानून की बजाय पांच करोड़ लोगों वाले कानून को क्यों चुने? मैं समझता हूँ कि तुलनात्मक दुष्टि से मिताक्षर कानून प्राचीन ग्रामीण समुदायों की दृष्टि से लागू किया गया था, जिनकी मुख्य सम्पत्ति, कृषि-भूमि होती थी। यह समाज की उस अवधारणा पर आधारित था, जिसमें जन्म का अधिकार और जीवन-यापन शामिल था। परन्तु हम उस प्रारंभिक समुदाय से तेजी से उभरते हुए एक आधुनिक समुदाय में आ रहे हैं, जिसमें सम्पत्ति अचल से चल में परिवर्तित होती जा रही है। अब आपकी अचल सम्पत्ति कम होती जा रही है और चल सम्पत्ति बढ़ रही है। यहाँ तक कि अचल सम्पत्ति, चल सम्पत्ति में परिवर्तित की जा रही है, यह परिवर्तन, शेयरों, नकद बचत, जमा राशि और सरकारी प्रतिभूतियों तथा अन्य रूपों में हो रहा है। अतः हमें वह व्यवस्था अपनानी चाहिए जो वास्तविक अचल सम्पत्ति से अवास्तविक और काल्पनिक सम्पत्ति में बदलाव के साथ काम आती है। जहाँ बड़ी मात्र में अवास्तविक सम्पत्ति होती है, वहां यह जन्म संबंधी अधिकार वास्तव में अव्यावहारिक होता है। आप इसे लागू नहीं कर सकते। यह सदैव पिता का अधिकार होता है कि वह प्रतिभूतियाँ अथवा शेयरों अथवा चल संपत्ति का निपटान करे। एक पुत्र के लिए यह संभव नहीं है कि उसे विरासत में शेयर का अधिकार मिले। उसके लिए कृषि भूमि का अधिकार विरासत में मिलना संभव है, किन्तु नकद प्रतिभूतियों अथवा अन्य चल सम्पत्ति में उसे विरासत का अधिकार मिल पाना संभव नहीं है। इसीलिए ऐसा है कि इस विधेयक द्वारा मिताक्षर कानून की बजाय दायभाग व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई हैः ऐसा इसलिए नहीं है कि मिताक्षर कानून बीस करोड़ लोगों का अनादर करता है, न ही इसलिए कि इसे दायभाग कानून की तुलना में कोई विशेष प्राथमिकता दी है, आज, जन्म के बाद से ही विरासत में प्राप्त अधिकार और जीवन-यापन का अधिकार पिछड़े हुए और अव्यावहारिक हो चुके हैं।