हिन्दू संहिता - जारी... - Page 633

618 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक विदेशी, एक बाहरी व्यक्ति को लाना बहुत असुविधाजनक हो सकता है। पर मैं पहले ही बता चुका हूँ कि अब सम्पत्ति, अचल से चल सम्पत्ति में परिवर्तित हो रही है।

डॉ. पी.एस. देशमुख (सी.पी. एवं बिरारः सामान्य)ः ऐसा कैसे हो सकता है? भू-संबंधी समस्त सम्पत्ति कभी समाप्त नहीं हो सकती। हिंदू संहिता विधेयक भूमि को विलुप्त नहीं कर सकता।

माननीय श्री के. संथानमः जहाँ तक कृषक समुदाय का संबंध है, विवाह होने पर वे स्वतः अलग हो जाते हैं। यदि एक दामाद गांव में आकर रहना चाहता है, तो मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उसे अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

डॉ. पी.एस. देखमुखः इसके बाद, नियम यही होगा कि फूट डालो और राज करो।

माननीय श्री के. संथानमः यदि पुत्रों को बांटा जा सकता है, तो पुत्री को भी बांटा जा सकता है। भविष्य में सम्पत्ति में नगर प्रतिभूतियां और अन्य चीजें भी शामिल होंगी। अतः, ऐसा कोई कारण नहीं है कि पुत्री को पुत्र के समान अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। समायोजन के उद्देश्य से, मैं एक या दो बातों को छोड़ने को तैयार हूँ। एक परिवार में विवाहित पुत्रियों के हिस्से के आकलन के मामले में, मैं सोचता हूँ कि कोई धनराशि निर्धारित करना अनुचित नहीं होगा, जो उनके विवाह के लिए खर्च की जा सकती है। कई मध्यम वर्गीय परिवारों में, विवाह-समारोहों पर किया जाने वाला

खर्च पुत्री को मिलने वाले हिस्से से यदि अधिक नहीं तो अक्सर बराबर तो होता ही है। पर मैं सोचता हूँ कि यह एक बेहतर निर्धारण होगा। इसी प्रकार, यदि केवल एक निवास-स्थान हो अथवा कृषि-भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा हो, तो मैं सोचता हूँ कि यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जहाँ तक पुत्री के हिस्से का संबंध है, उसे मकान में अथवा अचल सम्पत्ति में से एक हिस्सा दिए जाने की बजाय नकद रूप में अथवा चल सम्पत्ति के रूप में उसका हिस्सा दे दिया जाना चाहिए।

चौ. रणबीर सिंह (पूर्वी पंजाबः सामान्य)ः पर वह नकदी कहाँ से आएगी?

माननीय श्री के. संथानमः यदि आपका कोई साहूकार है, तो आपको नकदी कहाँ से प्राप्त हो जाएगी? क्या यह संभव नहीं है? इसकी अदायगी आसान वार्षिक किस्तों में या किसी अन्य तरीके से की जा सकती है। एक सौहार्दपूर्वक परिवार में समायोजन सरल ही होगा। पर जिस परिवार में सौहार्द नहीं है, वहाँ न्यायालय भी किसी पक्ष से भेदभाव के बिना इस बोझ को समायोजित करने के लिए कोई उपाय सुझा सकता है। इन समायोजनों की शर्त पर, मुझे ऐसा कोई तर्कसंगत औचित्य दिखाई नहीं पड़ता कि पुत्री को भी पुत्र के समान ही सम्मान क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी प्रकार की कठिनाई है। पर हर प्रकार के हौवे खड़े किए गए हैं। आखिरकार,