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एक पुत्री ही वधू बनती है। यदि पुत्री को एक हिस्सा मिलता है, तो इसी प्रकार दूसरे घर में भी पुत्री को उसका हिस्सा मिलता है और आगे चलकर, पुरुष और स्त्री के बीच आत्म-सम्मान और सामाजिक समानता स्थापित करते हुए कानूनी अधिकारों के समायोजन के सिवाय, सम्पत्ति संबंधी व्यवस्थाएं काफी हद तक समान हो जाएंगी, क्योंकि वर्तमान समय में पुत्री अपने पिता के घर से कुछ लेकर नहीं जाती-उससे अधिक उसे अपने ससुर के घर में प्राप्त हो जाता है। अब से, विधेयक के तहत, उसे अपने पिता के घर से थोड़ी-बहुत प्राप्ति होगी_ जो ससुर के घर की प्राप्ति से कम ही होगी। पर आगे चलकर, सम्पत्ति के बँटवारे में अधिक अन्तर नहीं रहेगा। अतः यह प्रक्रिया सभी संबंधितों के लिए संतोषप्रद, और अधिक आत्म-सम्मान वाली होगी। पुत्री यह महसूस करेगी कि वह भी अपने भाई के बराबर सम्मान पा रही है_ केवल वही सब-कुछ नहीं है। मैं सोचता हूँ कि हमें इस भावना को पूरे देश में प्रोत्साहित करना चाहिए। नीतियों में हमने सभी सामाजिक असमानताओं को समाप्त कर दिया है_ हमने महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार दिए हैं। तो उत्तराधिकार और विरासत के मुद्दे पर ही क्यों लिंग संबंधी भेदभाव बरता जाए? मैं सोचता हूँ कि जितनी जल्दी हम स्वेच्छा से भेदभाव करना छोड़ देंगे, देश उतना ही सशक्त होगा। अन्यथा, किसी न किसी दिन, वयस्क मताधिकार के आधार पर पूरे देश में महिलाओं में इतनी भावना जागृत हो जाएगी कि हमें परिवर्तन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। तब तो भारत के पुरुषों के लिए यह शर्मनाक बात ही होगी। इसलिए बेहतर होगा कि आप अग्रिम रूप से अब वयस्क मताधिकार प्रदान करें, ताकि हम संभवतः पांच अथवा छह करोड़ महिलाओं, जिन्हें वोट देने का अधिकार होगा, के पास जाकर यह कह सकें कि ‘‘देखिए आपने जो चाहा था हमने वही काम कर दिखाया है_ हमने आपको मताधिकार दिलाया है_ हमने आपको सम्पत्ति का अधिकार दिलाया है_ आप पुरुषों के समकक्ष हैं। अब लिंग भेद संबंधी विवाद नहीं होंगे।’’
इस प्रश्न का अंतिम बिंदु है, सुधार। अब तक विवाह के मामलों में शायद ही सुधार का कोई प्रयास हुआ है। अतः यह आंशिक रूप से वैकल्पिक और आंशिक रूप से अनिवार्य है। मैं चाहता हूँ कि मेरे सभी मित्र और इस सदन के सदस्य उठें और कहें कि क्या वे इस सुधार को अनुमोदित करेंगे अथवा नहीं। वे इस विषय पर चुप्पी साधे हुए हैं और तीन घण्टे तक बोलने के बावजूद, मुझे नहीं पता चल पाता कि लोग इस विषय से बचते क्यों हैं? तो वे एक विवाह-प्रथा को लागू करना चाहते हैं अथवा नहीं?
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः एक विवाह प्रथा पहले से ही स्थापित है।
माननीय श्री के. संथानमः फिर भी कुछ लोग वास्तव में दो अथवा अधिक पत्नियां होने का लुत्फ उठाते हैं, तो कुछ अन्य एक से अधिक पत्नियां होने की संभावना का मानसिक लुत्फ उठाते हैं।