620 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री एच. वी. कॉमथः बहुपति प्रथा के बारे में क्या ख्याल है?
माननीय श्री के. संथानमः मैं कहता हूँ कि यह एक ऐसी बात है कि जिसमें प्राचीन आर्य परम्परा ने एक भारी गलती की थी। अब यही समय है कि हम, जो महान आर्यों को अपना यशस्वी पूर्वज मानते हैं, यह स्वीकार कर लें कि यह एक भूल थी और इसमें स्वेच्छा तथा सर्वसम्मति से सुधार कर लें। अब बहुविवाह प्रथा जारी नहीं रहनी चाहिए। किन्तु जब तक आप बहुत बड़े मामलों के लिए तलाक की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराते, समस्त और संपूर्ण एक विवाह-प्रथा भी एक कल्पना बन जाएगी। अतः जब तक हम ऐसी व्यवस्था नहीं कराते, बुराइयाँ जारी रहेंगी।
श्रीमती रोहिणी कुमार चौधरीः क्या आप सहमत हैं कि पर-पुरुष गमन के लिए महिलाओं पर भी मुकदमा चलाया जाना चाहिए?
माननीय श्री के. संथानमः मैं मानता हूँ कि समान अपराधों के लिए महिलाओं को समान सजाएं दी जा रही हैं किन्तु असम के मेरे माननीय मित्र इस विषय के संबंध में सहृदय हैं। एक विवाह-प्रथा और तलाक के प्रावधान साथ-साथ चलते हैं। उन्हें एक समन्वित कानून के रूप में लिया जाना चाहिए और इस संबंध में यह विधेयक एक सुधार का सुझाव देता है जो शास्त्रों द्वारा भले स्वीकृत न हो, किन्तु यह एक सुधार हैख्...,
पंडित गोविन्द मालवीय (उ.प्र.ः सामान्य) क्या मैं यह समझूं कि यदि तलाक को स्वीकृति नहीं मिलती है तो माननीय सदस्य एक विवाह-प्रथा का विरोध करेंगे?
माननीय श्री के. संथानमः मैं किसी भी स्थिति में एक विवाह-प्रथा का समर्थन करूंगा। यदि मेरे मित्र एक विवाह-प्रथा का पक्ष लेते हैं और उसी समय कोई पति यदि नपुंसक अथवा एक अपराधी घोषित हो जाता है, तो ऐसी हालत में तलाक न होना जैसी ‘विपरीत स्थिति’ नहीं होनी चाहिए। अतः मैं सोचता हूँ कि वे एक असंगत स्थिति में एक विवाह-प्रथा को जारी रखना चाहता है। पर मैं इसकी एक संगत स्थिति चाहता हूँ। हमारी सोच में यही फर्क है।
मैं केवल एक और पहलू की बात करूंगा। इस विधेयक की एक और महान विशेषता की जो जाति-प्रथा से समस्त कानूनी लड़चने समाप्त कर देगी। हमने संविधान द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया है। अब हम सामाजिक सुधार को आगे बढ़ाना चाहते हैं और जाति से संबंधित विधि अड़चनों को समाप्त करना चाहते हैं। इस विधेयक में चाहे यह विवाह हेतु हो अथवा किसी अन्य उद्देश्य के लिए, तथा कथित अछूतों से लेकर तथाकथित आचार्य ब्राह्मणों में सभी हिंदू हैं- सभी एकसमान हैं।
कुछ माननीय सदस्यः किसी जाति के बिना, हिंदू कौन हो सकता है?