हिन्दू संहिता - जारी... - Page 640

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कई सदियों से प्रचलित परंपराएँ मौजूद हैं। इसमें सभी आस्थाओं को समाहित किया गया है और कृष्णावन्तोविश्वमार्यम के आदर्श के साथ निरंतर प्रगति की है। फिलहाल हिंदुत्व में ऐसी प्रगतिशीलता है, जिसमें जीवन के सभी विभिन्न रूपों में समाहित किया गया है। वर्तमान में हिंदुत्व एक लचीली व्यवस्था है, किंतु ऐसी यह सदा नहीं रही है। हमारा धर्म किसी व्यक्ति-विशेष के धर्म-सिद्धांतों या पुस्तक-विशेष पर आधारित नहीं है, अपितु धर्म क्या है, पर आधारित है। और धर्म का अर्थ हैः धारयते अनने इति धर्मे या धारणात् धर्मेम्ः इत्यादुह धर्म वह है जो समाज को बनाए रखे। इसी आदर्श पर हिंदू समाज आधारित है अर्थात् जो समाज के आस्तित्व और विकास के लिए आवश्यक है। निःसंदेह मैं स्वीकार करता हूँ कि हिंदू समाज की मौजूदा स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। किंतु ऐसी स्थिति लम्बे समय तक नहीं रहेगी। इसीलिए मैंने आपका ध्यान इस ओर दिलाया है क्योंकि तभी आप इस पर विचार करेंगे कि इस विधेयक पर आपत्ति क्यों की गई है। कारण यह है कि समाज को बनाए रखना ही धर्म है और समाज को बनाए रखना हमारा आदर्श है। वर्तमान में हमारा समाज कुछ स्थिर भी प्रतीत हो सकता है, किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। हिन्दूत्व अपने उत्कर्ष के दौरान बड़े परिवर्तनों के दौर से भी गुजरा है। मैं इसके परिवर्तनों से भयभीत नहीं हूँ, क्योंकि अतीत में भी इसमें कई परिवर्तन हुए हैं। एक समय था, जब इस भूमि पर बौद्ध धर्म फल-फूल रहा था और यह ने केवल भारतवर्ष में फैला अपितु भारत वर्ष से बाहर भी दूर-दूर के देशों तक फैला था। किंतु आज बहुत कम बौद्ध यहाँ रह गए हैं। उनका क्या हुआ? हिंदू धम्र में ही शामिल हो गए हैं। उनमें आमूल-चूल परिवर्तन हो गए हैं और मौजूदा पीढ़ी ही उनकी उत्तराधिकारी है। इससे पता चलता है कि हम कौम नहीं हैं और हमने समाज की परिवर्तनशील आवश्यकताओं के अनुरूप अपने को ढाल लिया है। ब्रिटिश शासन के दौरान भी हमारे कानून में कई परिवर्तन हुए हैं, अतः मैं उन लोगों में नहीं हूँ, जो कहते हैं कि हिंदू कानून में परिवर्तन नहीं होने चाहिए। पिछले अध्यक्ष माननीय श्री सनथानम ने सही कहा था कि न्यायालयों द्वारा न्यायिक विवेचनाएँ, जो उत्तराधिकार दत्तकग्रहण और विवाह से संबंधित विभिन्न कानूनों के नियम-सिद्धांतों के अनुकूल नहीं हैं, उनसे न केवल हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में बदलाव आया है अपितु कई विसंगतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। अतः हमें उन विसंगतियों को दूर करना चाहिए। और अपने कानून को बदलते समाज की जरूरतों के अनुसार बनाना चाहिए। पूरा विश्व बड़ी तेजी से बदल रहा है, अतः हम भी इससे अछूते नहीं रह सकते हैं। हम यह नहीं कह सकते कि हम अपने को बाकी दुनिया से अलग रखेंगे। यह कोई नया विचार नहीं है। किंतु कानून का संहिताकरण एक अलग प्रक्रिया है और उसका संशोधन एक अलग बात है। यहाँ एक विधेयक दोनों बातें चाहता है अर्थात् यहाँ हम कानून को संहिताबद्ध करना चाहते हैं और इसके प्रावधानों में संशोधन भी करना चाहते हैं। जहाँ तक संहिताकरण का संबंध है, तो मेरा मानना है कि हम विसंगतियाँ दूर करना चाहते हैं। आज