हिन्दू संहिता - जारी... - Page 641

626 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के दौर में हमारे पास कानून की कई तरह की प्रणालियाँ हैं। कई स्थानों पर दायभाग है तो कई स्थानों पर मिताक्षर प्रचलित है और ‘बाम्बे स्कूल’ की अपनी विशेषताएँ हैं तथा दक्षिण भारत के कुछ भागों में इसे मारूमकट्टयम के नाम से जाना जाता है। किंतु जिन क्षेत्रों में यह प्रचलन में है वहाँ यह सुपरिभाषित है और किंचित मात्र में स्थिरता भी है, इसलिए यदि हम वर्तमान में सर्वप्रथम सु-परिभाषित क्षेत्रों में कानून के संहिताकरण की कार्यवाही शुरू करते हैं, तो इससे न केवल एकरूपता आएगी अपितु व्यापक स्तर पर संशोधन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। मात्र कानून के संहिताकरण से अधिक विवाद भी नहीं होगा, क्योंकि यह कानून मौजूद है। इस प्रश्न की इसे ब्रिटिश न्यायधाशों के न्यायालयों में संशोधित किया गया है, के बावजूद इसमें किंचित स्थिरता है। इसलिए यदि हम अपने को केवल संहिताकरण तक सीमित रखते हैं, तो मेरा मानना है कि आज जो इतना ज्यादा विरोध दिख रहा है वह नहीं होगा। केवल इतना ही नहीं, बल्कि यदि हम केवल संहिताकरण करते हैं, तो हम जनता का सौहार्द भी पाएंगे और मेरा विश्वास है कि इसके बाद धीरे-धीरे और अन्य मामलों के लिए हिंदू संहिता में संशोधन करना भी आसान हो जाएगा। किंतु मौजूदा कानून में जिस तरीके से संशोधन करने का प्रस्ताव किया गया है, वह एक अलग मामला है। जब से राउ समिति गठित हो गई थी तब से जो साक्ष्य लिए गए हैं और जो रिपोर्टें और विधेयक तैयार किए गए, उनमें दोनों मामले एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया। अर्थात् संहिताकरण के साथ-साथ संशोधन भी। यकीनन दोनों पूरे नहीं हो सके हैं। यदि वे अपने को मात्र संहिताकरण तक सीमित रखते, जो ऐसा उन्हें काफी समय पहले कर देना चाहिए था। पर अब तो मामला संशोधन के स्तर तक पहुंच गया है। अस्तु, मेरा इस सब पर यही दृष्टिकोण है।

मैंने पूर्व में कहा था कि यह विधेयक तीन विभिन्न मामालों में संबंधित है अर्थात् विवाह, विरासत और उत्तराधिकार से। आईए, देखें कि इस पर हमारे समाज का प्रमुख विचार क्या है? जीवन में आधुनिक विचारों, आधुनिक शिक्षा और आधुनिक पद्धतियों के प्रभाव के परिणामस्वरूप यकीनन जनसाधारण के मस्तिष्क पर भी प्रभाव पड़ा है। विशेषकर देश की शिक्षित महिलाओं पर और हमने अपने संविधान में समानता के सिद्धांत को भी स्वीकार किया है, इसलिए सरसरी तौर पर देखा जाए तो सहज रूप से यही कहेगा कि उत्तराधिकार के मामले में किसी पुत्र या पुत्री के मध्य भेदभाव क्यों किया जाता है। किंतु मामला इतना सीधा-सरल भी नहीं है। एक पिता की इच्छा पुत्र या पुत्री को बेहतरी में कोई फर्क नहीं दिखता है। स्वभावतः, उसका प्यार और प्रभाव एक-समान ही होता है। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति यह नहीं सोचेगा कि पुत्र को सब कुछ मिले और पुत्री वंचित रहे। असल में, ऐसा हुआ भी नहीं है। यहाँ मध्यम वर्ग के परिवारों के हवाले भी दिए गए थे। यदि हम धनाढ्यों को अलग रखें, जिनकी संख्या काफी कम है, तो हम पाते हैं कि एक पिता अपने पुत्र को अपेक्षा पुत्री के विवाह पर ज्यादा खर्च करते हैं। अनेक मामलों