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में अपने पुत्रों की शिक्षा पर लगने वाला खर्च भी पुत्री पर कर दिया जाता है। मैंने यहाँ ‘अनेक मामलों में’ कहा है इन मामलों को मैं इसी तरह देखता हूँ। तब उत्तराधिकार के मामले में विरोध क्यों हो रहा है? इसके लिए हमें अपने हिन्दू समाज के संपूर्ण ढांचे पर अवश्य विचार करना चाहिए। मैंने माननीय मित्र पंडित मुकुट बिहारी भार्गव ने इस संबंध में एक हवाला दिया था। मैं उसी बात पर थोड़े से समय में कुछ कहना चाहूँगा। हमारे हिन्दू समाज का संपूर्ण ढांचा कई सदियों के परिणामस्वरूप उभर कर सामने आया है। हमारे समाज की मूलभूत इकाई ‘परिवार’ है और इस परिवार को एक इकाई के रूप में निरंतर विकसित रखने से ही यकीनन हमारा समाज स्थिर रहेगा। परिवान बने रहना यकीनन हमारा मुख्य उद्देश्य है उसके साथ समय-समय पर हमारे सभी कानून और परंपराएं बनती रहती हैं। यहाँ मुख्य बात थी परिवार का बने रहना, जो इस ढांचे की इकाई थी। विवाह के बाद पुत्रियाँ सहज रूप से अलग परिवार की हो जाती हैं जबकि पुत्र निरंतर उस परिवार में बने रहते हैं। इस निरंतरता को बनाए रखने और इसे टूटने से बचाने के लिए संयुक्त परिवार पद्धति की शुरूआत हुई थी। संयुक्त परिवार पद्धति हिन्दू समाज की एक विशिष्ट विशेषता थी? क्योंकि हिंदू समाज का आधार है परिवार का बने रहना। इसी कारण से संयुक्त परिवार पद्धति हिंदू कानून में एक विशिष्ट संस्था है, जो कानून की अन्य पद्धतियों में नहीं है, क्योंकि अन्य पद्धतियाँ कमोवेश व्यक्तिवाद पर आधारित हैं। यही संयुक्त परिवार पद्धति, एक या दो पीढ़ी पहले तक सही तरीके से चलती रही है। इसने कई गत सदियों से हमारे सामाजिक ढांचे की निरंतरता और स्थिरता को भी बनाए रखा है। इसी कारण से अब पुत्री को उत्तराधिकार दिए जाने के संबंध में आपत्ति की जा रही है। यह आपत्ति राजनीतिक या सामाजिक कारणों से नहीं है बल्कि इसका कारण है कि यदि आपने पुत्री के उत्तराधिकार की इजाजत दी, तो संयुक्त परिवार पद्धति पर आधारित संपूर्ण सामाजिक संरचना ध्वस्त हो जाएगी।
आधुनिक विश्व का रूझान व्यक्तिवाद की ओर है। कई स्थानों पर संयुक्त परिवार पद्धति टूट रही है। मैं यहाँ तक कह सकता हूँ कि इन आधुनिक परिस्थितियों के अंतर्गत संयुक्त परिवार पद्धति ज्यादा लम्बे समय तक नहीं चल पाएगी, किंतु यहाँ प्रश्न यह है कि क्या हम धीरे-धीरे व्यक्तिवाद द्वारा प्रतिस्थापित कर रहे हैं या यथाप्रस्तावित कानून द्वारा इसे विखंडित करने की कोशिश कर रहे हैं। यदि हम तत्काल हिन्दू समाज को विखंडित करना चाहते हैं। तो मुझे भय है कि हम इस समाज की नींव को नेस्ता-नाबूद कर रहे हैं जिसके अनदेखे और अप्रतयाशित परिणाम सामने होंगे। खतरा मात्र यह नहीं कि पुत्रियों के उत्तराधिकार के रास्ते खुलें, बल्कि तथ्य यह है कि उत्तराधिकार की शुरूआत से संपूर्ण समाज प्रभावित हो जाएगा। इसलिए इसका इतना विरोध है। यदि हम प्रगतिशील प्रक्रिया द्व ारा परिवार के विखंडन की प्रक्रिया में मदद करते हैं, जो विभिन्न आर्थिक एवं सामाजिक कारणों से पहले ही शुरू हो चुकी है तो भी वही परिणाम होंगे जो हमारा लक्ष्य है, पर