हिन्दू संहिता - जारी... - Page 645

630 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नष्टे मृते प्रव्रलिते क्लीखे च पतिते पतौ

पंचत्स आपत्सु समुनाटीणा पतिरन्यों विधीयते।

लेकिन मुख्य मुद्दा जो मैं समझता हूँ यह है कि क्या आप कानून द्वारा एक विवाह-प्रथा को सुनिश्चित कर रहे हो या नहीं। पर यह तो नियम 10,000 में कम से कम 9.999 व्यक्तियों पर लागू होने जा रहा है। इसलिए इस प्रश्न से हमारे मस्तिष्क को आंदोलित नहीं होना चाहिए। महोदय, इन विचारों के अलावा यहाँ एक अंतिम बात यह है कि संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार एक सार्वभौमिक सिविल संहिता बनाने का अवश्य प्रयास करना चाहिए जिसे बनाने का अवश्य प्रयास करना चाहिए जिसे हमने पहले ही पारित कर दिया है। हमने अपने संविधान में एक नीति-निर्देशक सिद्धांत समाहित किया है कि पूरे भारत के लिए एक सार्वभौमिक सिविल संहिता बनाने का प्रयास जारी रहेगा। मैं चाहता हूँ कि आप गंभीरतापूर्वक विचार करें कि क्या इस प्रकार के कानून केवल हिंदूओं के लिए लागू करने से हम उस अपनी प्रगति के उस आदर्श की तरफ जा पाएंगे? अतः मेरा मानना है कि हम आगे जाने के बजाए पीछे की तरफ जा रहे हैं? मेरे माननीय मित्र श्री सनथानम को लगता है कि अनुच्छेद 44 के पारित होने के बाद इस कार्यवाही से हम उस आदर्श की तरफ जाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य हिंदुओं की एकता को संगठित करना है। ऐसा हो भी सकता है या नहीं भी हो सकता है। किंतु इस राष्ट्र की सुरक्षा के हित में क्या संगठित करने का अर्थ केवल हिंदूओं को संगठित करना है, अथवा इस राष्ट्र के सभी नागरिकों को संगठित करना है? क्या सभी भारतवासियों के लिए एक जैसा कानून नहीं होना चाहिए? विवाह, उत्तराधिकार आदि विश्व के सभी देशों की सिविल संहिताओं में शामिल किए जाते हैं, अतः भारत में भी ऐसा ही अवश्य करना चाहिए। इस तरह यह संहिता भारत के सभी नागरिकों पर लागू होनी चाहिए, चाहे वे हिंदू या ईसाई, पारसी या मुस्लिम हों। इस दृष्टिकोण से तो हम बिल्कुल विपरीत दिशा में जा रहे हैं। मैं आपको बताता हूँ क्यों? धार्मिक या अर्ध-धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की प्रच्छन्न नीति विदेशी सरकार की उपज थी। यह उनके हितों के कारण हम पर थोपी गई थी, न कि हमारे हितों के कारण, पर आज ऐसा क्या है, जो हमें एक समान सिविल संहिता में इन सभी बातों को शामिल करने से रोक रहा है?

मौजूदा हिंदू संहिता विभिन्न परिस्थितियों के अंदर निर्मित की गई थी और तब निर्मित की गई थी जब एक समान सिविल संहिता बनाने का कोई आदर्श हमारे समक्ष नहीं था। किंतु अब काफी परिवर्तन आ गए हैं विशेषकर पाकिस्तान बनने के बाद हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि देश के सभी विविधाओं को एक दूसरे के समीप लाया जाए, चाहे वे हिंदुओं, ईसाइयों, मुसलमानों या पारियों के मध्य हों। मैं नहीं चाहता कि ऐसे मामलों में केवल हिंदुओं के लिए कुछ किया जाए। हमने अपने देश के सभी नागरिकों को एक समान करने के उद्देश्य से पहले ही एक साथ चुनाव कराने का निर्णय ले लिया है। अतः एक समान सिविल संहिता से सभी व्यक्ति एक धारा में आ जाएंगे।